Friday, May 4, 2018

दास्ताने कूलर-ए-आजम



अदा और डील डौल में वैसा ही रूआब मानों नए चलन की डब्बा कारों में एम्बेसेडर, बाइकों में एनफील्ड या फिर ट्रैक्टरों में आयशर हो! जी हाँ! ऐसा ही है हमारा राजे-रजवाड़ों के जमाने का कूलर। जितना पानी आजकल के मामूली कूलर दिन भर में खर्च करते हैं उस से कहीं ज्यादा तो यह जनाब एक बार में  फिजूल बहा देते हैं। यह उन सड़क-छाप कूलरों में नहीं जिन्हें घर के छुटके भी कान पकड़ कर इधर से उठा कर उधर बैठा देते हैं। गर्मी का सीज़न आया नहीं कि बालिश्त भर ऊंची चार ईंटों के तख्ते ताऊस पर इन्हें उसी ठाठ से गद्दीनशीन किया जाता है जैसे गए जमाने में राजाओं की रस्मी ताजपोशी किया करते थे। फिर किसी की क्या मजाल जो पूरे सीज़न भर इन्हें अपने सिंहासन से डिगा सके! 



यूं देखें तो इस कूलर में गिनती के दो एक ऐब भी थे। इधर पानी की जबर्दस्त किल्लत मगर इनकी रईसी में कोई कोर कसर नहीं! महाशय यूं ही पानी गटागट कर जाते हें गोया गाड़ी का कोई पुराना मॉडल डीज़ल पी रहा हो।  साथ ही एक और दिक्कत भी थी। पानी भरने में जरा भी चूक हुई कि इसके जिस्म के अनगिनत नामालूम सूराखों से पानी का मुसलसल रिसाव शुरू हो जाता है। फिर तो फर्श पर बहते पानी को सुखाने के लिए आपको घड़ी-घड़ी पैड़ बदलने पड़ते हैं। लिहाजा जितना पसीना कूलर की हवा खाने से सूख नहीं पाता है उस से कहीं ज्यादा, पानी को सुखाने के चक्कर में बहाना पड़ जाता है। कुछ-कुछ वैसे ही जैसे चन्दन घिस-घिस कर लगाने से सरदर्द में फायदा जरूर मिलता है, मगर चन्दन घिसना अपने आप में एक बहुत बड़ा सरदर्द है!

बहुत माथापच्ची के बाद इस मसाइल का हल हमने कुछ यूं निकाला कि कूलर के लिए पानी की छोटी-छोटी ख़ुराकें तजवीज़ कर दी।  ठीक उसी तरह जैसे किसी शूगर के मरीज़ के लिए दिन में पाँच छः छोटे-छोटे  मील बांध दिये जाते हैं। इसका लाभ यह हुआ कि कूलर के ऊपरी हिस्सों में बने बारीक सूराखों का गला खुद ब खुद घुट कर रह गया। लेकिन इस ईलाज़ ने एक नयी बीमारी पैदा कर दी। अब दिन का हमारा ज़्यादातर समय पाइप को टोंटी में लगाने और फिर तह कर उसे उठाने में गुजरने लगा। यदि ईमानदारी से उस वक़्त  का हिसाब लगाया जाता जब हम कूलर की हवा में रहे, और जब कूलर के बिना रहे तो दोनों में कोई खास फ़र्क़ नहीं आता। उस पर मुसीबत यह कि आप पल भर के लिए भी गाफ़िल नहीं रह सकते थे। पानी कम रह जाए तो मोटर के फुंक जाने  का खतरा,  ज्यादा भरा जाए तो फिर ओवरफ़्लो से निपटने की आफ़त...यानि कूलर वापरना एक दुधारी तलवार पर चलना था!

अलबत्ता सौ खोट होने पर भी उस में कुछ खास था जो हम उसके सब नाज़-नखरे खुशी-खुशी उठा लेते थे। दरअसल वह आजकल के तथाकथित स्मार्ट कैटरीना कैफ नुमा कूलरों में से नहीं था जो सिर्फ अपने सामने के गलियारे में खड़े बंदे को बस  उतनी ही ठंडक पहुंचा पाते हैं जितनी कि भरी दुपहरी में किसी बिजली के खंभे की छाया में खड़े होने पर मिलती है। हमारा यह कूलर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के जहां तहां प्रकाश करने वाले आज के खद्योत सम कवियों की तरह नहीं वरन सूर-सूर, तुलसी- शशि के समान है। यह घर भर का पारा कुछ ही मिनटों में हाथ भर नीचे गिरा देता है। इसके सामने ए. सी. भी एकदम फेल है! हाँ, लगे हाथों एक बात और... जहां आज के कूलर जेठ के महीने से जूझते हुए बजबजाने लगते हैं, यह इस खामोश अदा से अपना काम करता है मानो कोई ऋषि वन में मौन तपस्या कर रहा हो अथवा कोई हंस झील पर मंद-मंद तैर रहा हो। तभी तो घर में आने जाने वाले सब लोग इसका जलवा देख कर हैफ में सुध बुध खो बैठते हैं। तब  अपना सीना गर्व से सम्राट अशोक के अधीन भारत-भूमि सा चौड़ा हो जाता है!

इति, दास्ताने कूलर-ए-आजम!!

Thursday, April 19, 2018

घर का जोगी जोगड़ा



घर के बाहर आप कितने  ही तुर्रम खाँ बने क्यों न घूमते हो, घर के अंदर आपकी औकात धपई भर की नहीं है। भले ही दुनिया भर को ये पता हो कि रिश्ते में आप रामानुजन के परपौत्र लगते हैं, अंकों की जादूगरनी शकुंतला देवी भी आपके सामने फेल है...और यह भी कि आप संख्याओं से यूं खेलते हैं जैसे सपेरों की सन्तानें करैत और कोबरा से खेलती हैं या फिर मछुआरों के बच्चे समंदर की ऊंची-ऊंची लहरों से खेलते हैं। मगर इस सब से क्या होता है? माह की हर पहली-दूसरी  तारीख को घर में दूध के लगाए गए आपके हिसाब को तो आपकी श्रीमती जी तब तक सही नहीं मानती जब तक वह खुद हिसाब करके न देख ले!!  अगर आपको हजार रुपये दे कर किराने की दुकान पर सामान लाने को भेजा जाता है, तो आने पर आपको उनके कई सवाल झेलने पड़ते हैं, जैसे- क्यूँ जी, सामान कितने का आया? मान लो आपने कहा- सात सौ बहत्तर रुपये का, तो तत्काल एक और सवाल आप पर दाग दिया जाता हैं- वो तो ठीक है, मगर कितने रुपये वापस किए दुकानदार ने?...यानि उन्हे आपकी काबिलियत पर इतना एतबार हो ही नहीं हो पाता कि आपने बकाया यानि पूरे दो सौ अट्ठाईस रुपये दुकानदार से वापिस ले लिए होंगे!

अभी कल ही की बात है। पड़ोस की एक श्रीमतीजी हमारी वाली को उनके पतिदेव की गोपनीय रिपोर्ट बता कर गयी। बताने से पहले ये वचन लिया के वे इसे गोपनीय ही रखेंगी।  आश्वस्त होने पर खुल कर बोली- क्या कहूँ बहन जी! पता नहीं अपने मियां जी काहे के साइंटिस्ट हैं एक तरकारी तक तो ढंग की खरीद नहीं सकते, फिरोजी रंग का सूट मंगाओ तो आसमानी उठा कर चले आते हैं! मैं तो कहती हूँ जो आदमी मूंग और मसूर में फ़र्क नहीं कर सकता वो क्या खाक रिसर्च करता होगा! उधर हमारे एक और एम.बी.ए मित्र हैं बहुत बड़ी कंपनी के सी.ई.ओ। वे जिस भी कंपनी में जाते हैं उसे ही मुनाफ़े में ला खड़ा करते हैं। उन्हीं की मार्फत कंपनी बड़े-बड़े सौदे करती हैं। मगर अपनी पत्नी की नज़र में वे खुद एक घाटे का सौदा हैं क्योंकि अगर सब्जी वाला दस के दो के हिसाब नींबू दे रहा हो तो बीस के पाँच नींबू तक की डील करना तो उनके बस की बात नहीं है! और तो और वे टूथपेस्ट का ऑफर वाला 150 ग्राम का पैक छोडकर 100 ग्राम वाला उठा कर ले आते हैं। दुनिया के लिए होंगे आप मेनेजमेंट गुरु....बिजनेस बढ़ाने के नए-नए आइडिया बांट कर लोगों पर धाक जमाने वाले! मगर अपने घर में तो आप अक्ल के वह पैदल हो जो धनिया मिर्ची भी जेब के पैसे लगा कर खरीदता है! जबकि आपकी धर्मपत्नी अलग-अलग तीन चार ठेलों से सब्जी खरीदकर आपसे ज्यादा धनिया मिर्ची फोकट में इकट्ठा कर लेती है। 
  
चलो मान लिया कि आप एक बड़े भारी खगोलवेत्ता हैं! सब ग्रह-उपग्रह आपकी गणनाओं के गुलाम हैं। आप उनके लिए जैसी भी लकीर खीच देते हैं वे उसी के फकीर हो जाते हैं। फिर आँख पर बंधे कोल्हू के बैल की तरह रात दिन एक ही लय ताल मे वहीं चक्कर काटते रहते हैं। सूरज को भी ठीक उसी घड़ी में ग्रहण लगने लगता है जो आपके द्वारा निश्चित कर दी गयी होती है। चन्द्र ग्रहण भी आपके तय किए गए समय पर खुद ब खुद खत्म हो जाता है...बिना एक मिनट इधर या उधर चूके हुए। मगर आपकी यह सारी विद्या वेधशाला की चौहद्दी के अंदर ही काम आती है .....सुबह घर में प्रवेश करने के साथ आपकी सारी खगोल-विद्या देहरी पर ही छूट जाती है। नाश्ते में पत्नी के पूछने पर पराँठे की इच्छा जताने के बावजूद प्लेट में जब दलिया मिलता है (इस नेक सलाह के साथ, कि दलिया हल्का और पेट के लिए मुफ़ीद होता है!) तब महान खगोल शास्त्री को अच्छी तरह समझ में आ जाता  है कि ब्रह्माण्ड के हर छोटे बड़े ग्रह-उपग्रह की चाल पर नजर रखना एक बात है किन्तु पत्नी की किसी भी चाल को पकड़ पाना बिलकुल ही दूसरी बात है। दरअसल पत्नी के सामने पड़ते ही आपकी सारी विद्या छूमंतर हो जाती है और देखते ही देखते आपकी आत्मा एक महापंडित का चोला छोड़ महामूर्ख के चोले में प्रवेश कर जाती है!

यानि हमारे पुरखे सही ही कह गए है....कोई जोगी घर के बाहर कितना ही सिद्ध क्यूँ न हो जाए,  घर के भीतर तो उसे जोगड़ा ही रहना है!!  


Wednesday, November 1, 2017

दीवाली, पटाका और पटाखा


दिवाली के आते ही घरों में पटाखे आदि लाये जाते हैं. या यूँ कहें कि दिवाली तभी आती है जब पहले पटाखे आदि ले आये जाते हैं. पटाखा बिन दिवाली कंगली-कंगली, अमंगली दिवाली मानी जाती है . खैर पटाखे लाये जरूर जाते हैं मगर घर में तब तक दाखिल नहीं हो पाते जब तक पहले उन्हें छत पर सूर्यदेव के श्रीचरणों में मत्था टिकवा कर उनका आशीर्वाद न दिलवाया जा चुका हो. इसके पीछे मान्यता है कि ऐसा करने से पटाखे ऐन वक़्त पर दगा नहीं देंगे अर्थात किसी ऊपरी बाधा के चलते फुस्स हो कर नहीं रह जायेंगे. यह रस्म कुछ-कुछ वैसी ही है जैसे नई बाइक खरीदते समय निबाही जाती है. बाइक को शो रूम से सीधे खजराना गणेश मंदिर में पुजारी जी से बाधा-हरण टीका लगवाने के बाद ही घर लाया जाता है.

छत की कड़ी धूप में संक्षिप्त परीक्षण के बाद जब यह विश्वास हो जाता है कि पटाखे फूटने लायक हो चले हैं, अनारों से अब सीटियाँ नहीं शोले बरसेंगे और चकरियां जो हैं वे चक्कर काटते-काटते अचानक घुटने टेक कर नहीं बैठ जाएँगी तब उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी घर के भीतर आने दिया जाता है. आते के साथ ही सबसे पहले पूरे ढेर में से क्रिकेट टीम का एक हिस्सा निकाल कर अलग रख दिया जाता है. ताकि पाकिस्तान पर जीत का कानफोड जश्न मनाया जा सके और जरूरत बगैर-जरूरत अपनी पीठ पर देशभक्ति का ठप्पा भी लगवाया जा सके. इसके बाद एक और हिस्सा  डोल ग्यारस पर सोये हुए देवों को उठाने के लिए उठा कर एक तरफ कर दिया जाता है. अब जो अस्सलाह  बचता है उसे दिवाली के दिन जनता जनार्दन- खास कर बुजुर्गों, बीमारों, कमतरों, कमजोर दिलवालों और बे-जुबान चौपायों के नाक में दम करने के काम में समर्पित कर दिया जाता है. गली मोहल्लों में पटाखे बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से फोड़े जाते हैं. दिवाली के एक अरसा पहले बाकायदा रेकी करायी जाती है. जानकारों का एक दल उस खास जगह की खोज करता है जहाँ से धमाकों का लुत्फ़ तमाम रहवासियों तक बराबर-बराबर पहुँचाया जा सके. दिवाली वाले दिन चौघडिया देख कर पटाखे फोड़ने के शुभ मुहुर्त की खबर घर-घर भिजवा दी जाती है.

गौर से देखा जाये तो आतिशबाज़ी का काम कुछ-कुछ तक इश्कबाज़ी जैसा है. दोनों ही कामों को सरअंजाम करने के लिए साथियों का सहारा लिया जाता है. अक्सर देखा गया है कि दब्बू किस्म के कुछ इंसान जब तक बिना रुस्वा हुए छोकरी को पटाने की योजना बनाने में भिड़े रहते हैं तब वह किसी मनचले के साथ रफूचक्कर हो चुकी होती है. ठीक ऐसा ही मंजर आतिशबाजी में भी देखने को मिलता  है. इधर टोली के कुछ दानिश्वर पानी की बाल्टी, रेत की ढेरी वगैरह के इंतजाम में लगे रहते हैं उधर कोई फिरकीबाज तब तक अनार फुलझड़ी चला चुका होता है. इन दोनों कामों में लज्ज़त तो खूब है मगर जोखिम भी कुछ कम नहीं हैं. दोनों में ही उम्र भर के दाग मिल जाने का खतरा है, जान पर बन जाने का भी डर है. ज़िगर मुरादाबादी ने क्या खूब कहा है-     

 ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजे 

 इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

तो मियां, पेपर पर बम रख कर पेपर को आग लगा देने से बम नहीं फूटा करते, पेपर जरूर जलाया जा सकता है! आतिशबाजी का जलवा उसी के नसीब में आता है जो सुतली बम की आँखों में आँख डाल आग से खेल कर उसे फोड़ने की हिम्मत रखता हो. अगर आपको अपनी जान प्यारी है तो आतिशबाज़ी को तो भूल ही जाइए.... चाहो तो बच्चों के साथ मिल कर  चहकते हुए यहाँ वहां टिकलियाँ फोड़ते फिरिए. बकौल फ़ारूक बख्शी-      

ये सौदा इश्क़ का आसान सा है

ज़रा बस जान का नुकसान सा है

सुनते हैं त्रेता युग में रामजी हुए किन्तु उस युग में पटाखे हुए कि नहीं, मुझे नहीं पता. हो न हो पटाखे रहे भी हों....क्यूंकि उस युग में जब शून्य था, पुष्पक विमान था तो पटाखों की क्या मजाल जो रहने से इंकार कर दें. खैर, खुदा न खास्ता गर वाकई उन दिनों पटाखे थे तो सोचा जा सकता है कि रामजी के जी पर क्या गुजरी होगी जिन्होंने एक नहीं, दो नहीं, पूरे चौदह बरस कुदरत के बीच शांति में गुजारे थे. अयोध्या वापसी पर जब उनका विस्फोटक स्वागत हुआ होगा तो वे आने वाले दिनों में राज-काज संभालने लायक तो क्या ही बचे होंगे! सो ज्यादा संभावना इसी बात की है कि भरत से मिली अपनी खडाऊं फिर से उन्हें सौंप कर वापस वन को लौट गए होंगे. खैर! रामजी की तो रामजी जानें. अलबत्ता दिवाली की रात आप हम पर क्या गुजरती है यह सब अच्छे से जानते हैं. रात के ढाई तीन बजे हैं. बमुश्किल अभी-अभी आँख लगी है. अचानक ऐसा लगता है जैसे किसी ने आपके बिस्तर के ठीक नीचे विस्फोट कर दिया हो. आप बिस्तर से उछल कर जमीन पर आ गिरते हैं. सोचते हैं निश्चित ही यह कोई दहशतगर्द था जो अलार्म लगा कर सोया होगा ताकि सोये लोगों पर घात लगा कर हमला कर उन्हें आतंकित किया जा सके.


दिवाली तो किसी तरह गुजर जाती है मगर अपने पीछे सड़क पर जगह-जगह कचरे के महकते हुए ढेर छोड़ जाती है. जिन्हें देख कर लगता है जैसे जांबाज टुकड़ियों के बीच भोर होने तक आपस में जमकर धमाकेबाज़ी हुई हो. सुना है जिसकी लीद बड़ी हो वही जानवर बड़ा कहलाता है. इसी तर्ज़ पर दिवाली की पटाखा प्रतियोगिता में  भी जिसका कचरा ज्यादा हो वही दल खुद को मन ही मन जीता हुआ मान लेता है. जहाँ तक अपना सवाल है हमें इस बात का सख्त मलाल रहेगा कि किनारे बैठ तमाशा देखने वाले हम जैसे बुजुर्ग इस कचरा अभियान में कोई जाति योगदान नहीं दे सके. इसके लिए हमें उस दिन का इन्तजार है जिस दिन आतंकवादियों की तकनीक हमारे हाथ आ जाएगी और हम भी अपनी बालकनी में खड़े-खड़े मोबाईल के रिमोट कंट्रोल से धमाका कर धरती के सालाना साज-सिंगार में अपना अल्प किन्तु बेशकीमती सहयोग दे सकेंगे.            


Monday, October 9, 2017

लाई हयात आये क़ज़ा ले चली चले …उर्फ़ प्रोफ़ेसर जौक़ साहब का रिटायरमेंट भाषण

कई नादान यह समझते हैं कि मोहम्मद इब्राहीम जौक़ ने अपनी मशहूर ग़ज़ल 'लाई हयात आये कज़ा के चली चले, हम अपनी ख़ुशी आये अपनी ख़ुशी चले' अपने इन्तेकाल के वक़्त कही थी. अरे मरदूदों! जानते नहीं कि शोक सभा उस वक़्त की जाती है जब मुर्दे को सुपुर्दे खाक़ कर दिया गया हो या फिर उसकी कपाल क्रिया की जा चुकी हो. ऐसी सूरत में बन्दे के पास कुछ कह सकने की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है! अब आप को बताएं कि यह ग़ज़ल प्रोफ़ेसर जौक़ साहब ने उस दिन कही थी जिस दिन उन्हें समारोहपूर्वक सेवा से निवृत्त किया जा रहा था और आखिर में मंच से चंद अल्फाज़ बोलने को बुलाया गया था.

उनका कहना था कि वे अपनी मर्जी से तो पेशे में आये थे ही अपनी मर्जी से रिटायर ही हो रहे हैं. क्या है कि वे एक के बाद एक क्लास पास करते गए और तब तक पढ़ते रहे जब तक किसी दूसरी नौकरी के काबिल रहे. इस विश्वविद्यालय में भी वे डंके की चोट पर आये हों ऐसी बात नहीं है. उन्होंने कई जगह अर्जियां डाल रखी थी. बस इत्तेफ़ाक था कि वे यहाँ सेलेक्ट हो गए और इधर के होकर रह गए. यहाँ से चलने के वक़्त भी किसी ने उनसे पूछा थोड़े ही था. वे धोनी, तेंडुलकर की तरह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी तो थे नहीं कि कोई उनसे यह पूछता कि वे कब रिटायर होना चाहेंगे. पूछते तो वे जरूर कहते कि ऐसी भी क्या जल्दी पड़ी है! मुओं, सेकंड ईयर वालों को कोर्स तो पूरा कर लेने देते. फर्स्ट ईयर वालों का यूनिट टेस्ट लेने दिया है तो उन्हें कॉपी दिखाने की मोहलत तो दे दी होती. ये भी कोई बात हुई कि मुकर्रर दिन चार भाइयों को इकठ्ठा किया और पहुँच गए विदाई हॉल में चलता करने!

अपने भाषण को आगे बढाते हुए प्रोफ़ेसर साहब ने अगला मिसरा यूँ सुनाया...
          हो उम्र--खिज्र तो भी कहेंगे -वक्ते-मर्ग
          हम क्या रहे यहाँ अभी आये अभी चले

फिर सभा को समझाने के लहजे में वे बोले- पैंसठ के हो गए हैं, रिटायरमेंट की बेला गयी है मगर फिर भी ऐसा लग रहा है जैसे हम अभी-अभी यहाँ आये हों. जुम्मा-जुम्मा चार दिन तो हुए हैं अभी यहाँ! अभी हमारी पढाई हुई चेली ही विभाग की हेड बन पाई  है, अभी तो उनके शागिदों को गद्दी संभालना बाकी है. उम्र का क्या है, वह तो बेल की तरह चढ़ती जाती है. उम्र के चढने से जिस्म जरूर कुछ ढला है, मगर पढाने का जज्बा नहीं! क्लास में परफॉर्म कर रहे हैं. जेहन उतना ही तेज़ है जितना बत्तीस साल पहले था. मजाल है जो कोई सूत्र भूल जायें या गुणा-भाग में कोई गफलत कर बैठते हों. बेशक कुछ दांत गिरे हैं मगर आवाज़ की बुलंदी नहीं....और आप हैं, अभी से हमें बोरिया बिस्तर समेटने को कह  रहे हैं!!

विभाग में मंजूर अहमद सर, जौक़ साहब के बेहद करीबी रहे है. दोनों बीसियों साल से एक अलहदा किस्म के कार्यक्रम में कदम से कदम मिला कर साथ चलते आये हैं. मंजूर साहब भी अगले महीने रिटायर हो रहे हैं. जौक़ साहब उम्मीद कर रहे थे कि विभाग में सालों साल  उनके दोस्त रहे अहमद सर भी आखिरी वक़्त उनके साथ चल देंगे. (आखिर स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति भी कोई चीज़ है!) सेवा काल में साथ दिया है तो क्या सेवा निवृत्ति में नहीं देंगे! लेकिन जब समारोह में मंजूर साहब ने उनकी तरफ रस्मी गुलदस्ता बढाया तो दुनिया की बेवफ़ाई के  ख्याल से वे सीधे धरती पर आन गिरे. जी में आया कि बढा हुआ गुलदस्ता नामंजूर कर दे, मगर फिर कुछ सोच कर गुलदस्ता रख लिया. सोचा- यहीं तक सबका साथ है, जितना मिले जैसा मिले वैसा निभाते चलो. कल विभाग में जाओगे तो कौन पूछेगा! पता चलेगा कि मंजूर साहब क्लास ले रहे है, या किसी बैठक में भाग ले रहे हैं या इंस्पेक्शन पर शहर से बाहर गए हुए हैं. तब उन्होंने बेहद उदासी और बेबसी की फिजां में यह शेर कहा...

दुनिया ने किसका राह--फ़ना में दिया है साथ
तुम भी चले चलो यूँ ही जब तक चली चले

सुनते हैं कि आखिरी सफ़र पर चलते वक़्त आदमी की आँखों के सामने उसके सभी गुनाह और गलतियाँ किसी फिल्म की रील की तरह गुजर जाती हैं. जौक़ साहब को भी बड़ा मलाल हुआ कि उन्होंने एहसान साहब के मशविरे पर 'सी. पी. ऍफ़.' क्यों ऑप्ट कर दिया था काश उस दिन उन्होंने पेंशन ली होती तो रिटायरमेंट के बाद भी 'सेवेंथ पे कमीशन' का लाभ मिल गया होता. उनके मन में जो चल रहा था वह उन्होंने इस शेर में बांधा...

जाते हवा--शौक़ में इस चमन से जौक़
अपनी बला से बादे सबा अब कभी चले

और यह कहने के बाद कुछ पल वे खामोशी से अपनी जगह खड़े रहे. फिर आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए अपनी कुर्सी पर पतझर की तरह ढेर हो गए और अपने पीछे चमन को गुलज़ार कर गए.

खैर! चलते-चलते आपको एक पते की बात बताते चलें....हैरत मत करना! उस ज़माने के इब्राहीम जौक़ ही आज के प्रोफ़ेसर त्यागी कहलाये!!