Sunday, January 15, 2017

गुरूजी पुत्र-विवाह, आशीर्वाद और नोटबंदी

कई दिनों से गुरूजी के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी. था क्या कि गुरूजी के पुत्र के विवाह को सिर्फ बीस दिन बचे थे कि नोटबंदी का ऐलान हो गया. गुरुपत्नी द्वारा मिलाई के लिए बनाये गए पांच-पांच सौ के नोटो के लिफाफे कागज़ की रद्दी हो कर रह गए. गुरु जी अकेली जान...कहाँ-कहाँ किला लड़ाते! पुराने नोट बदलवाने की कतार में खड़े होते कि कैश का राशन लेने की लाइन में लगते. उस पर हालात ऐसे कि एटीएम् यूँ  खुलते जैसे कई रोज के कर्फ्यू के बाद जरूरी सामान की खरीद फ़रोख्त के लिए सिर्फ महिलाओं के लिए बाजार खुलते हैं. गली मुहल्लों के एटीएम् पर लोग इस ढब टूट पड़ते जैसे गृहिणियां सब्जी के ठेले पर टूट पड़ती हैं. मगर वही एटीएम् जब बंद होते तो ऐसे जैसे सीजन ख़त्म होने पर बर्फानी बाबा के कपाट बंद कर दिए जाते हों. शटर डाउन है तो तो बस डाउन है- चाहे कितनी ही देर रात जाओ या कितने ही मुंह अँधेरे! उधर रोज-रोज बैंकों के आगे भी तिरुपति बालाजी के भक्तों  जैसी लम्बी-लम्बी कतारें देख कर गुरूजी की आँखों के आगे अँधेरा छा जाता. कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करें! इसी सांसत में दो चार रोज और गुजर गए.

आखिर गुरूजी ने फैसला कर लिया. मन गवाही तो नहीं दे रहा रहा था किन्तु आपात धर्म का ख्याल कर उन्होंने अगले रोज़ अपने सभी शोधार्थियों को अपने कक्ष में तलब कर लिया. सब इकठ्ठा हुए तो गुरूजी गभीर आवाज़ में बोले- आप तो जानते ही हैं कि बेटे की शादी को अब फ़क़त दो सप्ताह बचे हैं. तरह-तरह के कामों में खर्च करने के लिए कैश की जरूरत होगी. अपने शिक्षकीय जीवन में मैंने कक्षा के बाहर आपकी जरा भी मदद की हो, आपकी जरूरत के समय घर बुला कर आप लोगों की परियोजना आदि बनवाने में सहायता की हो तो आज उसका बदला चुकाने का वक़्त आ गया है. सुनते ही सब जोश में भर कर कहने लगे- आप आदेश करें गुरुदेव, हम कुछ भी करने के लिए तैयार हैं! गुरूजी ने चेताया- नहीं, सोच लो. काम उतना आसान नहीं जितना आप लोग समझ रहे हैं. देश नोट की कतारों में खड़ा है, उधर एटीएम्/ बैंकों में नगदी का टोटा है. लोग ब्रह्म-मुहूर्त में एटीएम् पर पहुंचते है, घंटों भूखे प्यासे खड़े रहते हैं लेकिन अपनी बारी आने से पहले नोट ख़त्म हो जाते हैं. एक उत्साही छात्र ने लगभग हुंकारते हुए जवाब दिया- सर, मुझे मंजूर है! मैंने अपनी बेटी के लिए आधी रात को लाइन में लग कर उसके दाखिले का फॉर्म हासिल किया था. पर मुझे मंजूर नहीं- गुरूजी ने अपना जवाब दो टूक स्पष्ट करते हुए कहा- मैं अपने लिए एक बाल बच्चेदार आदमी की जान जोखिम में कदापि नहीं डाल सकता. सुनते ही छात्र का मुंह लटक गया. इस पर गुरूजी पिघल गए और उसे सांत्वना देते हुए बोले- ठीक है, तुम रिज़र्व में रहोगे. और हाँ, दूसरों को जब-जब पानी, नाश्ता अथवा खाने की जरूरत लगेगी तो तुम उन तक रसद पहुँचाने का काम भी करोगे ताकि उन्हें नोट लिए बगैर क़तार से न हटना पड़े. फिर बाकी बचे शोधार्थियों के नाम चौबीस-चौबीस हजार के चेक काट कर दे दिये और कहा कि बैंक से भुगतान लेकर मुझे दे दें.

अगले दिन से शुरू हुआ 'ऑपरेशन पिंक' गुरूजी का कमरा बन गया कंट्रोल रूम. शाम को दिन भर का कलेक्शन गिना जाता और अगले दिन की स्ट्रेटेजी बनायी जाती. पहले दिन का कलेक्शन रहा सिर्फ बारह हजार...एक विद्यार्थी को बैंक वालों ने चौबीस हजार के चेक के बदले सात हजार थमाए तो दूसरे को पांच हजार ही पकड़ा कर हाथ जोड़ लिए. कई विद्यार्थियों को बैकों के दो-दो तीन-तीन चक्कर लगाने पड़े तब जा कर सप्ताह भर में कुल जमा एक लाख बासठ हजार का रोकडा इकठ्ठा हो पाया. सबसे बड़ी रकम जो कोई छात्र निकाल लाने में कामयाब रहा वह थी छत्तीस हजार. यह करिश्मा अंजाम देने वाला गुरु भक्त आरुणि स्वयं शादीशुदा और बाल बच्चेदार विद्यार्थी था. पूछताछ करने पर पता लगा कि पति पत्नी दोनों नोटों की लाइन में लगे थे! और उस दिन बच्चों की स्कूल से छुट्टी करा कर पहले नाना नानी के घर छोड़ आये थे.


खैर, कैश का इंतजाम तो हो गया किन्तु गुरूजी के चेहरे पर रौनक का इंतजाम अभी भी नहीं हो पाया. रात में सोते-सोते गुरूजी को बुरे सपने आते. नींद से अचानक उठ बैठते, पसीना-पसीना हो जाते. ना, ना, वह बात नहीं जो आप सोच रहे हैं...उन्हें नोटों के चोरी जाने का खटका नहीं था. दरअसल वे सपने में देखते कि मेरिज गार्डन एकदम खाली है. उन्हें डर था कि नोटों के सूखे के चलते घंटों कतार में लग कर हाथ में आये दो हजार रुपयों का एक बड़ा हिस्सा खर्च करने भला शादी में कोई क्यों आएगा! गुरूजी के छात्रों को पता लगा तो उन्होंने इसका इलाज भी खोज लिया. एक छात्रा बाजार से स्वाइप मशीन खरीद लायी. वहीँ एक अन्य छात्रा ने बैनर बना दिया, जिस पर लिखा था- कैश ना होने पर कृपया निराश न हों. यहाँ सब प्रकार के डेबिट कार्ड के माध्यम से कैशलेस आशीर्वाद स्वीकार किये जाते हैं.  

Thursday, September 29, 2016

एक टीचर की क्षमा वाणी उर्फ़ मिच्छामी दुक्कडम


प्यारे विद्यार्थियों! आज आप सब अपना कोर्स पूरा कर घर जा रहे हैं. चले जाने के बाद मुमकिन है आप इधर का रुख कभी न करें. लिहाजा हम लोगों के लिए यह  आखिरी मौका है. सो, आप सब को हाजिर नाजिर मानते हुए आज हम आपके सामने सारे गुनाह कबूलना चाहते हैं. और उम्मीद करते है कि बड़ा दिल रखते हुए आप सब हमें माफ़ फ़रमाओगे.

जब भी मैं क्लास में घुसा हूँ तो अक्सर मैंने दो चार विद्यार्थियों को ऊंघते हुए, यहाँ तक कि टेबल पर सर टिकाए बाकायदा सोते हुए भी पाया है. अपने बचकाने जोश में उन्हें जगा कर हमने उनसे मीठे-मीठे सपने छीनने का गुनाह किया है. हमें क्या हक था कि उन्हें चैन की नींद से जगा कर उनमे सीखने की बेचैनी जगाते! अगर वाकई हम में कोई कूवत  होती तो 'ब्रेव न्यू वर्ल्ड' के डायरेक्टर की तरह उन्हें सोते में पढ़ाने का करिश्मा जरूर कर पाते. हम अपने नौसीखिएपन पर सर से पैर तक शर्मिंदा हैं और आपसे माफ़ी के तलबगार हैं.

शहर के कई कालेज अपने विद्यार्थियों को बिना क्लास में जाये डिग्री प्राप्त करने की सुविधा मामूली शुल्क पर देते है. मगर हमने आप सबको बिला नागा क्लास में आने पर मजबूर कर आपके समानता के अधिकार का हनन करने का अपराध किया है. मौका मिला होता तो क्लास से बचे हुए समय का सदुपयोग करते हुए आप भी अपने दूसरे तेज तर्रार साथियों की तरह छात्र राजनीति में उतर सकते थे. वरना औसत दिमाग के पढ़ाकू किस्म के विद्यार्थियों की तरह डिप्टी कलेक्टरी की राह तो पकड़ ही सकते थे. मगर अपने  अमानवीय कृत्य से आपका सुनहरा भविष्य छीन कर हम लोग आपसे दो कौड़ी की मास्टरी के लिए दस से पांच तक घिस्से लगवाते रहे. आप पर ढाए गए इन जुल्मों के लिए हमारी अंतरात्मा आज हमें बेहद कचोट रही है, जिसके निवारण के लिए आपके कदमों में आज हम अपना माफ़ीनामा पेश करते हैं.

गए ज़माने में हमारे टीचरों ने हमारी पीढ़ी के सावन भादों बरबाद किये थे, जिसका बदला हमने आपके सावन भादों बरबाद करके ले लिया. इस तरह गुरु ऋण चुकता किया. लिहाज़ा जिस वक़्त आपको अपने महबूब की जुल्फ़ें सुलझानी थीं हमने आपको दीगर सवालों में उलझाये रखा. उधर हरी भरी वादियों में मोरनियों के झुण्ड से घिरे मोर जी भर कर नाच रहे होते, इधर आप लोग क्लास की चारदीवारी के अंदर ऊलजुलूल फार्मूलों को साधने में हांफ रहे होते. यह सब हमारी  करनी का फल था जो आप भोग रहे थे. अपनी इस हरकत पर आज हमें बेइंतहा पछतावा हो रहा है. उम्मीद है कि आप हमारी पीढ़ी की इस खता को माफ़ कर दोगे.

माँ-बाप अपनी औलाद के लिए क्या कुछ नहीं करते! औलाद अगर नालायक हुई तो डोनेशन दे कर दाखिला दिला देते है, पढ़ाई में औसत है तो सेटिंग कर यूनिवर्सिटी टॉप करा लेते हैं. कहा गया है कि उस्ताद के लिए शागिर्द, औलाद की तरह ही होते हैं. लेकिन हमसे आपके लिए कुछ नहीं हुआ, जिसका हमें भारी अफ़सोस है. सरकारी मास्टर की भीरुता के चलते हमने गैस पेपर की आड़ में आपको प्रश्नपत्र आउट नहीं किये. आप कभी पास होने की गरज से एक दो नंबर माँगने भी चले आए तो हम फ़ौज की तरह यूँ अड़ गए मानों पाकिस्तान ने पुंछ या अखनूर मांग लिया हो. हम चाहते तो आपको संतान सुलभ लाभ पहुंचा सकते थे, पर नहीं पहुंचा पाए. परीक्षा हाल में भी फ़र्ज़ निभाने के नाम पर हम छापा मार कर यूँ चिटें बरामद करते फिरे जैसे आयकर अधिकारी काला धन बरामद कर रहे हों. नक़ल करते हुए पकड़ कर परीक्षा से बाहर करते हुए हम भूल गए कि बच्चा कितना भी बड़ा क्यूँ ना हो जाये आखिर रहता तो बच्चा ही है. कन्हैय्या की माखन चोरी समझ कर यशोदा की तरह झूठ-मूठ गुस्सा करते हुए माफ़ भी तो कर सकते थे! अपने इस गुनाह के लिए आज हम आपसे करबद्ध  क्षमा माँगते हैं.

सत्र भर हम आपकी जान के पीछे पड़े रहे, फिर भी चाहते हैं कि आप हमारे लिए दिल से इब्ने इंशा का यह शेर कहें:

कौन निभाता है उम्र भर ताल्लुक इतना

ऐ मिरे जान के दुश्मन तुझे अल्ला रखे               

Wednesday, June 29, 2016

नाना जी पर इतना हक़ तो बनता है...!

[व्हाट्स एप पर मैसेज आया... "नाना जी, आपने पिछली बार जो पोयम लिखी थी वो हमारी मिस को बहुत पसंद आई थी. इस बार भी एक लिख दें प्लीज़...प्लीज़...! किसी भी डिश पर". हमने 'छोले' पर एक कविता लिख दी. अगले दिन फिर मैसेज आया, "घर में लड़ाई हो रही है. बड़ी वाली कह रही है कट्टों के लिए नानाजी से लिखवा दी...मेरे लिए भी लिखवाओ" सो घर की शांति के लिए हमें एक और लिखनी पड़ी...सो भी अंग्रेजी में. जैसी भी बन पड़ी सोचा ब्लॉग के मित्रों को भी पढ़वा दें! सो, हाजिर है...]

छोले
रोज फेंकती जाल
कहती मुई को माल
खूब रांधती दाल
पर मुझे पसंद हैं छोले
खा जाऊं बिन बोले.

     सन्डे हो या मंडे
     रोज खिलाती अंडे
     वरना पड़ते डंडे
     मुझको भायें छोले
     खा जाऊं बिन तोले.

कद्दू, लौकी, तोरी
ठिल-ठिल भरी कटोरी
जब करती सिरजोरी
मैं कहती हौले-हौले
माँ, मुझे चाहियें छोले.

     लो, चढ़ा पतीला चूल्हे पर
     क्या महक उठा है पूरा घर!
     छाई मस्ती है तन-मन पर
     जियरा मेरा बस डोले
     वाह! आज मिलेंगे छोले.  

THE DROUGHT

Nights go
days come by,
Autumns depart
springs arrive.
Leaves fall dead
seedlings grow
It's nature bro!

            Man in his vanity
            and abandon gay,
            comes in forest's way
            raises skyscrapers
            inviting his doomsday!

Days go hot-n-hot
all around it's drought
Mother earth writhes in pain,
frog, cuckoo,  squirrel
are all slain!

            Your fervent calls
            propitiating gods,
            Sending escorts
            for bringing down showers
            Everything goes in vain.
            The rain then
            Never comes again!!


Monday, May 30, 2016

सन्डे क्रिकेट- पार्ट टू [पार्ट वन- "सन्डे मैच- त्यागी उवाच की सेंचुरियन पोस्ट"]


हाँ तो मेहरबान, कद्रदान...आप सुन रहे थे सन्डे क्रिकेट की दास्तान. अर्ज़ है कि यह न टी-ट्वेंटी है, न टेस्ट है, न वन डे है... यह क्रिक्रेट तो हुजूर बस सन्डे है. यहाँ न कोई बी. सी. सी. आई को मानता है न किसी आई. सी. सी को. अलबत्ता खेलने वाली टीमें जिन बातों पर राज़ी हो बैठें, उन्हें ही खेल का 'काजी' मान लिया जाता है. इधर देखिये...यहाँ 'वन-ए-साइड' मैच खेला जा रहा है. बल्लेबाज महाशय जो हैं वे गेंदबाजी को छोड़ कर बाकी जो भी करने का है वो सब कर रहे हैं! खड़िया पुते हाथों से स्कूल की घंटी बजा रहे शख्स से बेटी का दाखिला कराने आये पिता ने जब प्रिंसिपल के बारे में पूछा, तो बोला- मैं ही हूँ, कहिये! कुछ-कुछ ऐसी ही सूरते हाल यहाँ है. उधर क्रिकेट की एक नई विधा ईजाद की जा रही है. विकेट कीपर की जगह दूसरा बल्लेबाज छाया (डुप्लीकेट) बल्लेबाजी कर रहा है. चोंकिये नहीं! यह सन्डे क्रिकेट है, इसकी अपना राजपत्र है...यहाँ कुछ भी चलता है.

अब देखिये न, मैदान तो एक है किन्तु मैच न जाने कितने खेले जा रहे हैं! 'जिसने पेट दिया है, गिजा भी देगा' के भाव से भरे डंडियाँ हाथों में लिए बच्चों-बड़ों के दल के दल हर सन्डे सुबह इस मैदान की ओर उमड़ पड़ते हैं. दशहरा मैदान सी भीड़ होने के बावजूद भी किसी न किसी ठौर डंडे गाड़ ही लेते हैं. मजे की बात यह है कि इस पर भी इक्का दुक्का झुण्ड मैदान के किनारे खड़ा हुआ देखा जा सकता है- वीक एंड पर किसी रेस्टोरेंट में टेबल के खाली होने का इंतजार सा करता! ताकि ज्यूँ ही मैदान का कोई हिस्सा खाली होने को आये, झपट्टा मार कर कब्ज़ा लिया जा सके. अब इस मोड पर आगे बढ़ने से पहले गर कोई यक्ष-नुमा श्रोता पूछ बैठे-  "किस्सागो! आखिर इतने मैच एक ही मैदान पर खेले जा रहे हों तो आखिर इस जमघट में खिलाडी को इस बात का इल्म कैसे हो जाता है कि उसे इसी गेंद को फील्ड करना है?" तो इस पर अपना युधिष्ठिराना जवाब होगा - 'गेंद में एक आसमानी ताकत होती है, वह बू से सही खिलाडी को यूँ ही पहचान लेती है जैसे ढोरों के रेवड़ में कोई गाय अपना बछड़ा ढूंढ लेती है!!

चलो, अब आपको इस क्रिकेट की फील्डिंग का मुजाहिरा कराने लिए चलते हैं. इन महाशय को देख रहे हैं, इनमें बड़ी सिफ़त है... ये जिस जगह खड़े कर दिए जाते हैं वहीँ धरती को पकड वैसे ही खड़े रहते हैं जैसे शोपिंग विंडो पर दिन भर के लिए किसी बुत को खड़ा कर दिया जाये. आइये, अब जरा अगली टीम पर ध्यान लगायें. गौर करें तो इसके तमाम खिलाडी दो तीन ढेरियों में रखे जा सकते हैं. अव्वल तो वे हैं जिन्हें देख कर ऐसा मालूम होता है गोया उन्हें कैच छोड़ने की प्रेक्टिस करायी जा रही हो. दूसरी ढेरी में वे खिलाडी हैं कि अगर गेंद उनके बीचो-बीच से गुजर रही हो तो वे बूढी माँ की तरह गेंद के रक्षण का भार एक दूसरे के कन्धों पर डालते नजर आते हैं. तीसरी और आखिरी किस्म के खिलाडी वे हैं जो उस सूरत में, जब दूर-दूर तक कोई दूसरा मौजूद ना हो और गेंद सीधे उनकी छाती पर चढ़ी जा रही हो तो गेंद के साथ अजीबो-गरीब हरकत को अंजाम देने लगते हैं. देखो तो यूँ मालूम होता है मानों दोनों हाथों से ट्यूबवेल की मोटी धार को रोकने के नाम पर हर ओर से पानी निकलने का रास्ता दे रहे हों.

अब थोडा बल्लेबाजी का भी दीदार कर लीजिये तो बेहतर हो. इस बल्लेबाज को देख कर लगता है कि इसे बाउंसर खेलने का अभ्यास कराया जा रहा है. किसी बॉल पर बल्ला चल जाये तो ठीक वरना ऐसा नजारा नजर आता है जैसे रोटी बेलती गृहिणी बेलन की चोट से मच्छरों को रसोईघर की सीमा रेखा से बाहर भेजने की जुगत में भिड़ी हो. खुदाया शॉट लग जाये तो भी बल्लेबाज रन के लिए नहीं दौड़ता. सोचता है कि "क्यूँ भागूं...अगली बार इकठ्ठा चार रन ले लूँगा!" विकेटकीपर भी नहीं भागता, क्यूंकि बल्लेबाज क्रीज से बाहर ही नहीं निकला तो रन आउट किसे करे. फील्डर के भागने का सवाल इसलिए नहीं पैदा होता क्यूंकि उसे पता है सैर कर रहे कोई न कोई अंकल गेंद उठा कर फेंक ही देंगे. कुल मिला कर कस्बे की जिंदगी की तरह सब कुछ दुलकी चाल से  चलता रहता है जब तक थके-हारे ट्रक ड्राइवर को झपकी आ जाने पर हादसा सा कुछ न घट जाये और बल्लेबाज खुद की गलती से बोल्ड ही न हो जाये! ऐसे में टीम के तमाम खिलाडी बॉलर को घेर कर बधाइयों से यूँ दाब देते हैं मानों कस्तूरीरंगन ने पाकिस्तान की तरफ मुंह कर के कोई मिसाइल दाग दी हो.

क्रिकेट का अफ़साना कहा जा रहा हो और दर्शकों का जिक्र ही न आये तो यह उनके साथ नाइंसाफी होगी. मैदान के बाहर खड़े मैच देख रहे चंद युवकों को देख कर लगता नहीं ये मैच देख रहे होंगे. देख रहे होते तो कभी उछलते, डूबते-उतराते, चीखते-चिल्लाते. दिनकर के 'प्रलय पुरुष' की तरह यूँ ही सलिल प्रवाह नहीं देखते.... इसी तरह कुछ कमसिन युवतियां अपने सख्तजान भाई या बाप के पहरे से निकल कर मैदान के कोने में खड़ी अपने प्रेमी से मोबाईल पर चैट में नहीं लगी रहतीं!


सन्डे क्रिकेट से देश और देशवासियों को बहुत बड़ा फायदा हो सकता है. यदि आई. पी. एल. सन्डे क्रिकेट की तर्ज़ पर कई मैच एक साथ एक ही मैदान पर खिला ले तो पांच सात दिन में ही यह झंझट ख़त्म हो सकता है! ऐसा हो जाये तो देश महीनों तक बंधक न रहे.... और हमारी आपकी भी बस फुर्सत ही फुर्सत!         

Thursday, March 17, 2016

तीसरी परीक्षा... यानि मारे गए गुलफ़ाम

आज तक अपने हाथों जाने कितने फेल हुए हैं. किन्तु जब हम खुद टी.एम.टी. यानि ट्रेड मिल टेस्ट देने निकले तो दिल बल्लियों सा उछलने लगा. राम-राम जपते टेस्ट दिया. नतीजा निकला तो फेल करार दे दिए गए. डाक्टरों ने दिल तक आने जाने वाली नालियों के चोक होने का खटका जताया. भला हजरतों से कोई पूछे तीस साल के शादी शुदा और बाल बच्चेदार गृहस्थ के दिल का रास्ता क्या अब भी ब्रह्मपुत्र के फाट जैसा विशाल और निर्बाध होगा. खैर, किस्सा मुख़्तसर यह कि एक और टेस्ट- एंजियोग्राफी का फरमान सुना दिया गया.

तयशुदा समय पर कैथलेब ले जाये गए तो बीचो-बीच कपडे इस्त्री करने जैसी पतली लम्बी टेबल दिखी. उस पर फ़ौरन हमें यूँ लिटा दिया गया जैसे टाँगे फैलाये डायसेक्शन के लिए किसी मेंढक को लिटा दिया जाये. तभी डाक्टरों, नर्सों और वार्ड ब्वायों की भरी सभा में बिन कृष्ण की द्रौपदी की तरह हमारा चीर हर लिया गया. आपरेशन थियेटर की छत से इज्जत ढांपने की कोशिशें जब नाकाम रहीं तो हमने लाचारी में अपनी आँखें मूँद ली. तभी जाँघों पर चिपचिपा सा कुछ महसूस हुआ. ऑंखें खोली तो देखा मुए गलत जगह लेप लगा रहे हैं. अगले पल तो अपनी रूह ही कांप उठी, जब उन्होंने हमें दिवंगत मानते हुए हमारे बदन पर एक के बाद एक चादरें चढ़ानी शुरू कर दी. हम बारहा उन्हें टोकना चाहते थे, मगर चुप रहे कि नासपीटे कहीं खुन्नस में ऐसी वैसी जगह छुरी ना फेर दें और हम ज़माने को मुंह दिखाने के काबिल ही न रहें.

छुरी के अपना काम करने के साथ ही एक जमूरे ने उस शख्स के हाथ में, जो गाढ़ी यूनिफार्म में डाक्टर कम और मैकेनिक ज्यादा लग रहा था, क्लच वायर जैसा कुछ थमा दिया. फिर क्या था उस मरदूद ने वायर का एक सिरा हमारी जांघ को स्कूटर का हैंडल समझते हुए अंदर घुसाना शुरू कर दिया. अब आलम यह था कि इधर हम अपने दिल की खैर मना रहे थे तो उधर उन मसखरे डाक्टरों की पूरी मंडली दीवार बराबर स्क्रीन पर नज़रे गडाए वीडियो गेम का मजा लूटे जा रही थी. आखिर जब चौदह हजार के पैकेज का एक-एक रूपया फूंक चुके तो अपनी चादरे समेट हमें कटी पिटी हालत में मरहम पट्टी के लिए नर्सों के हवाले कर चलते बने. हालत थोड़ी संभली तो डाक्टर ने इत्तिला दी कि दिल की नालियां पूरी तरह चाक चौबंद हैं, कहीं कोई कचरा नहीं फंसा है. लिहाज़ा किसी तरह की सफाई खुदाई की कोई जरूरत नहीं है. अस्पताल में रात गुजार कर ख़ुशी-ख़ुशी घर आ गए.

अब आखिरी और सबसे कठिन परीक्षा शुरू हुई. अव्वल तो कई दोस्तों ने आपत्ति ली कि, "भला ऐसी भी क्या जल्दी पड़ी थी घर आने की....हमने रिसेप्शन पर फोन किया था, पता चला डिस्चार्ज हो गए!" उनकी इस उत्कट प्रेम भावना को देखते हुए हमने ठीक ठाक होने पर भी कुछ दिन और छुट्टी बढाने का फैसला ले लिया ताकि घर पर मरीज़ को गुलदस्ता पकड़ा कर अस्पताल न पहुँच पाने का मलाल दोस्तों के दिलों से जाता रहे. चूँकि छुट्टी ले ही ली थी तो विचार था कि सवेरे आराम से उठेंगे. मगर हमारी पत्नी जो थी वो परले सिरे की होशियार निकली. अलार्म लगा कर सोई थी, सो अलसुबह उठा दिया. हमने ऐतराज भी किया तो बोली, "इससे पहले कि आने जाने वाले शुरू हों, जल्दी से नहा धो कर नाश्ता कर लो...वरना खाने पीने से भी जाते रहोगे!" चुनांचे नाश्ते से निपटते ही तुरंत हमें दर्शनार्थियों हेतु ड्राइंग रूम में स्थापित कर दिया गया.

फिर तो दिन भर मिलने वालों का दो-दो, चार-चार तो कभी आठ दस की टुकड़ियों में यूँ आना जाना लगा रहा मानों सदियों के बाद लगने वाले सूर्य ग्रहण की तरह हमें देखने का सुयोग आगे न जाने कब हाथ लगे ! हालचाल पूछने वालों के सवाल "क्या हुआ था?" के जवाब में शुरू-शुरू में हमने उस तफसील से सिलसिलेवार बताया जिससे डाक्टर को भी क्या बताया होगा! हमारा उत्साह यूँ ही देखते बनता था जैसे किशोर उम्र में गाँव गवांड से दिल्ली आये रिश्तेदारों को हम लाल किला, क़ुतुब मीनार और बिरला मंदिर दिखाने ले जाया करते थे. किन्तु दिन चढते-चढ़ते दम फूलने लगा. सोचा कि टेप में रिकार्ड लगा कर बजा देते तो जान पर तो न बन आती. इतना सब करने पर भी कुछ मित्र शहर से बाहर होने के कारण देखने नहीं आ सके. वे सब अब सिरे से खार खाए बैठे हैं. उनका कहना है कि हमने जानबूझ कर उनके पीछे भर्ती हो कर उनका हक़ मारा है. हमारी इस नीच हरकत के लिए वे हमें ताजिंदगी कभी माफ़ नहीं करेंगे!


मर्ज़ से तो बच गए...मगर फ़र्ज़ से- मारे गए गुलफाम!!      

Sunday, December 6, 2015

छलक छलक जाये रे

सर्दियाँ भी क्या खूब जलवा फरोश हैं! अपने परचम तले पूरे हिंदुस्तान को एक कर देती हैं. बर्फ अगर कश्मीर के ऊपरी हलकों पर गिरती है, तो नज़ला सीधा इंदौर आ कर गिरता है. तब शहर के लोग रोज के काम यूँ अंजाम देते नजर आते हैं जैसे तेल से भरा पात्र लेकर नारदजी पृथ्वी की परिक्रमा पर निकले हों. बेताब सर्दी है कि किसी षोडशी की जवानी सी नाक के बाहर छलकी पड़ती है. चुनांचे बहती हुई नाक को घडी-घडी इस अदा से भीतर की ओर खींचते रहना पड़ता है गोया कोई लजाऊ युवती आँचल से फिसलता पल्लू संभालने का घनघोर जतन कर रही हो. इस मौसम में कुछ अलग किस्म के लोग भी पाए जाते हैं. ये नाक के चालू खाते से छोटी-छोटी रकमें सी निकाल कर रूमाल के सुपुर्द करते हुए जल्दी ही एक बड़ी रकम खड़ी कर डालते हैं....ताकि सनद रहे और वक़्त-जुरूरत काम आये! वहीँ कई बिंदास किस्म के लोग थोड़ी-थोड़ी देर बाद सड़क पर सरे आम यूँ बलगम विसर्जित करते चलते हैं मानो अस्वच्छता की वेदी पर अपनी छोटी सी आहुति के साथ-साथ मोदी जी को स्वच्छ भारत अभियान का मुफ्त आयडिया भी दे रहे हों.

शरद ऋतु राष्ट्र बाबा रामदेव के धंधे के लिए भी बेहद मुफीद साबित होती है. ठण्ड के दस्तक देते ही च्यवनप्राश की बिक्री के साथ-साथ बाबा के भक्तों की भीड़ भी कई गुना बढ़ जाती है. बाबा के अनुयायियों को वक़्त-बेवक्त वाश बेसिन के आगे अनुलोम विलोम की क्रिया में रत देखा जा सकता है. इस सब का नतीजा यह होता है कि कई नाजुक नासिकाओं के अग्र-भाग बार-बार पोंछे जाने के कारण लंगूर के पृष्ठ-भाग जैसे लाल-लाल निकल आते हैं. अलावा इसके भी सर्दियों के काफी फायदे हैं. मसलन घूंघट वाली बहुओं को खबरदार करने के इरादे से देहात के बड़े बूढों को झूठ-मूठ गला खंखारने की कसरत से निजात मिल जाती है. क्यूंकि सर्दियाँ वो शै है जो आते के साथ ही इनके गले में बिल्ली की घंटी की माफ़िक कुकुर खांसी को बाँध कर चली जाती हैं. यही वजह है कि जिन घरों में बड़े बूढ़े पाए जाते हैं उन घरों में अक्सर रात-बिरात चोर उचक्कों के डर से कुत्ता पालने की जरूरत नहीं पड़ती.

ठण्ड का मौसम आया नहीं कि छाती-गला मार्ग जम्मू श्रीनगर हाइवे कि तरह ठप्प हो जाता है और फिर एक अरसा बहाल नहीं हो पाता. इन दिनों में  'चंचल' और 'किशोर कुमार' जैसे गायकों के गले में सहगल और मुकेश उतर आते हैं. जहाँ 'किशोर कुमार' की आवाज़ का अल्हड़पन और शोखियाँ गायब हो कर प्रौढ़ता में तब्दील हो जाती हैं, वहीँ सातवें सुर को साधने वाले 'चंचल' पहले और दूसरे सुर पर बंद लगा कर सुबह-सुबह 'इक बंगला बने न्यारा, इक घर हो प्यारा-प्यारा' जैसे रियाज़ ले कर बैठ जाते हैं.


सच में बड़ी करामाती हैं सर्दियाँ, ये जो न करायें सो कम है!!

Sunday, November 1, 2015

यूपी वेड्स केरला


      25 मई 2015 का दिन. आन्दोलनकारी गुज्जर रेल की पटरियों पर, हम रेल में! यानी इतिहास रचने का पूरा-पूरा मौका. अफ़सोस, हम ही नहीं लपक सके! दरअसल हमारी होशियारी ही हमें ले डूबी. जाने हमें क्या सूझा जो हमने बेटे की बारात की यात्रा के लिए एक पूरा दिन रिजर्व में रख लिया. उधर दूल्हे और उसके खास मित्रों के फ्लाईट के टिकट बुक करा दिए. खैर, माना कि हमसे गलती हुई, पर रेलवे वाले तो सहयोग कर सकते थे! चाहते तो दर्जनों दूसरी गाड़ियों की तरह दिल्ली-त्रिवेंद्रम राजधानी को भी वे रद्द कर सकते थे. शर्म की बात तो यह है कि बदले हुए रूट पर चलाने के बाद भी वे उसे बारह घंटे से ज्यादा लेट नहीं कर पाए. इस सबका नतीजा यह हुआ कि हम इतिहास बनाते-बनाते रह गए.  हमारे बेटे की शादी को दुनिया की पहली ई-शादी होने के गौरव से वंचित हो जाना पड़ा. वरना हम रेल के डब्बे में स्काइप पर मंडप में बैठे पंडितजी से मन्त्र पढ़ रहे होते.

      आगे का किस्सा यूँ कि जहाँ बाप हम एक झटके में ही बन गए थे, वहीँ कानूनन बाप यानि फादर-इन-लॉ बनने के लिए हमें जाने क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े! अट्ठाईस की शादी बताई गयी थी किन्तु हमें सत्ताईस को ही अलसुबह उठा दिया गया. पता चला मंडपम के लिए हमें तैयार करने 'मेक अप आर्टिस्ट' आये हैं. फ़ादर-इन- लॉ न हुए, कोई कथकली कलाकार हो गए! फिर शुरू हुआ नौगजा धोती पहनने का कार्यक्रम! हमने बहुत ना-नुकुर की. कहा- हमें बख्शो भाई, शादी बेटे की है हमारी नहीं. बोले- चिंता मत करो उसे भी नहीं छोड़ेंगे. खैर, टॉपलेस वस्त्रम में मंडपम में लाये गए तो वहां उसी युनिफार्म में पिता अपनी पुत्री के संग पहले से मौजूद थे. दो तमिल पंडित उन्हें कुछ रस्में कराने पर पिले पड़े थे. हमें तत्काल संस्कृत भाषी पंडितों की दूसरी जोड़ी के हवाले कर दिया गया. उन्होंने बताया कि आपसे बेटे की शादी के लिए 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' माँगने के लिए कुछ रस्में की जायेंगी. कोई उनसे पूछे- भले आदमियों, पचास बारातियों को अड़तालीस घंटे की रेल तपस्या कराने के बाद क्या हम यह कहने को हाजिर हुए हैं कि हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं! अब जो नज़ारा नजरों के सामने था उसे देखने पर ऐसा मालूम होता था मानों अक्षय तृतीया पर जोड़ों का 'पेरेलल' में पाणिग्रहण चल रहा हो.

      फिर शुरू हुआ हमारी दुर्गति का असली सिलसिला. इस दुर्गति के दो तीन कारण थे...अव्वल तो बंद हॉल के अंदर लगातार मंगल-ध्वनि, उस पर हमारा जरा ऊँचा सुनना. दूसरे देवभाषा का हमारा कच्चा ज्ञान! तीसरी सबसे अहम् वजह जो थी, वो थी संस्कृत के मन्त्रों का तमिल बघार में हम तक पहुंचना. पर हम भी खाये-पिये थे. हमने बुदबुदा कर चकमा देने की वही स्ट्रेटेजी पकड़ी जो हम खुद के पाणिग्रहण में आजमा चुके थे. किन्तु यहाँ के पंडितजी बड़े चालाक निकले. प्रायमरी के किसी घाघ मास्टर की तरह वे अगले हरुफ़ पर तब तक नहीं पहुंचते, जब तक पिछला ठीक-ठीक नहीं बुलवा लिया जाता. इस दौरान हमसे क्या क्या हरकतें नहीं करवाई उन मरदूदों ने ! .... कभी वो हमसे कानों पर हाथ धरवाते, कभी हवा में सूत सा कतवाते. कभी उठक-बैठक लगवाते तो कभी दंडवत करवाते. मालूम होता था गोया पंडितों के चोगे में फायनल ईयर के सीनियर अपनी पूरी मंडली के साथ हमारी रेगिंग का मज़ा लूट रहे हों. मन में बारहा खयाल आता कि भाग खड़े हों, पर हनु के नुकसान की सोच कर रुक जाते. उधर लड़की के पिता भी अनजान बने बीच-बीच में कनखियों से हमारी दशा देख कर कुटिलता से मुस्कुरा देते. बचपन में पढ़ी लोमड़ी और सारस की कथा याद हो आई...समझ गए यह सारस का बदला है. सगाई के वक़्त फलौदा में जो गत हमने उनकी बनाई थी, उसी का फल गुरुवायूर में आज हम भुगत रहे हैं.

      सदया (केला पत्ता भोज) के ऐलान के साथ रस्में ख़त्म हुई, पर परीक्षा की घड़ियाँ अभी बाकी थीं. अपना तो सर ही चकरा गया जब सामने फैले केले के पत्ते पर कई कतारों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर सैकड़ों नैवैद्यम की फसल सी पलक झपकते ही रोप दी गई. अब ठीक उसी पहेली की सी सूरत थी जिसमे बताना होता था कि भूल भुलैय्या के इधर खड़ी बकरी दूर किसी कोने में रखे घास के ढेर तक कैसे पहुंचेगी! समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाया जाये, और जो खाया जाये वह कैसे खाया जाये. एक तरफ चटनी को सब्जी और सब्जी को चटनी समझने का पूरा खतरा था. तो दूसरी तरफ हलुवे को कढ़ी के साथ खाये जाते देख जगहंसाई का डर भी था. गनीमत ये रही कि हमारे बाजू में एक मल्लू भाई साहब आ बैठे. उन्हें देख-देख कर खाते हुए अपनी नैया भी वैसे ही पार लग गयी जैसे परीक्षा हॉल में होशियार बच्चे के ठीक पीछे बैठा बुद्धु बच्चा भी टीप टीप कर पास हो जाता है!