Friday, October 9, 2015

उसके इस तरह यूँ बे-रस्मी चले जाने पर

पहले मिल जाता
तो साले वो देता घुमा के
कि भूल जाता
सब को सोता छोड़
तमाम रिश्ते तोड़
सिद्धार्थ सा चले जाना.

      नालायक! कैसे भूल गया
      तू वो दिन
      घर से चला गया था
      बिन बताये जब कहीं
      क्या हाल हुआ था
      बदहवास बाप का उस रोज़?

गोद में खिलाया जिन्होंने
पकड़ उंगली चलना सिखाया
उन्ही को धता बता
हट्टा कट्टा बेशर्म
तू लपक कर चढ़ बैठा
बुजुर्गों के लिए
आरक्षित सीट पर!
बता, यही तमीज सिखाई थी
क्या हमने तुझे?

      जरूर उस रात
      गहरे अँधेरे में
      रतौंधी वाले दूत
      उतरे होंगे धरती पर
      उठा ले गए होंगे तुम्हें
         किसी और के धोखे
      पर चकमा दे कर
      भाग नहीं सकते थे
      तुम उनकी पकड़ से
      और दे नहीं सकते थे
      दस्तक अलसुबह दरवाजे पर!

लाचार माँ चिरौरी करते
थकती नहीं थी
हर बार मिलने पर- यही कि
'बिट्टन को कहना मिल जाये'.
जाना ही था, ससुरे!
मिल तो लेना था एक बार
उस बदनसीब माँ से
सदा-सदा के लिए

सफ़र पर चलने से पहले. 

11 comments:

  1. थोड़ा एडिट करना था, सेटिंग कुछ गड़बडा गयी है। घर जा कर डेस्क टॉप से मूल रचना कॉपी कर फिर पोस्ट करूंगा...तब तक क्षमा!

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  2. आज तो आपने इस लायक भी नहीं छोड़ा कि कुछ कह सकूँ! दिल कचोट गया कहीं भीतर तक!

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  3. आज तो आपने इस लायक भी नहीं छोड़ा कि कुछ कह सकूँ! दिल कचोट गया कहीं भीतर तक!

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  4. bahut dukhi krta hai kisi ka samay se pahle chala jana ...marmik abhiwayakti ....sir ..bahut dino se aise dukh ka samna kar rahi hoon ....

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  5. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मैं और एयरटेल 4G वाली लड़की - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  6. तुझमें कितना दर्द छुपा है, तू जाने या रब जाने। :(

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  7. आप सभी की संवेदना और संबल का आभार

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  8. Sentimental and touching!
    Very minute observation .......

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