Sunday, November 1, 2015

यूपी वेड्स केरला


      25 मई 2015 का दिन. आन्दोलनकारी गुज्जर रेल की पटरियों पर, हम रेल में! यानी इतिहास रचने का पूरा-पूरा मौका. अफ़सोस, हम ही नहीं लपक सके! दरअसल हमारी होशियारी ही हमें ले डूबी. जाने हमें क्या सूझा जो हमने बेटे की बारात की यात्रा के लिए एक पूरा दिन रिजर्व में रख लिया. उधर दूल्हे और उसके खास मित्रों के फ्लाईट के टिकट बुक करा दिए. खैर, माना कि हमसे गलती हुई, पर रेलवे वाले तो सहयोग कर सकते थे! चाहते तो दर्जनों दूसरी गाड़ियों की तरह दिल्ली-त्रिवेंद्रम राजधानी को भी वे रद्द कर सकते थे. शर्म की बात तो यह है कि बदले हुए रूट पर चलाने के बाद भी वे उसे बारह घंटे से ज्यादा लेट नहीं कर पाए. इस सबका नतीजा यह हुआ कि हम इतिहास बनाते-बनाते रह गए.  हमारे बेटे की शादी को दुनिया की पहली ई-शादी होने के गौरव से वंचित हो जाना पड़ा. वरना हम रेल के डब्बे में स्काइप पर मंडप में बैठे पंडितजी से मन्त्र पढ़ रहे होते.

      आगे का किस्सा यूँ कि जहाँ बाप हम एक झटके में ही बन गए थे, वहीँ कानूनन बाप यानि फादर-इन-लॉ बनने के लिए हमें जाने क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े! अट्ठाईस की शादी बताई गयी थी किन्तु हमें सत्ताईस को ही अलसुबह उठा दिया गया. पता चला मंडपम के लिए हमें तैयार करने 'मेक अप आर्टिस्ट' आये हैं. फ़ादर-इन- लॉ न हुए, कोई कथकली कलाकार हो गए! फिर शुरू हुआ नौगजा धोती पहनने का कार्यक्रम! हमने बहुत ना-नुकुर की. कहा- हमें बख्शो भाई, शादी बेटे की है हमारी नहीं. बोले- चिंता मत करो उसे भी नहीं छोड़ेंगे. खैर, टॉपलेस वस्त्रम में मंडपम में लाये गए तो वहां उसी युनिफार्म में पिता अपनी पुत्री के संग पहले से मौजूद थे. दो तमिल पंडित उन्हें कुछ रस्में कराने पर पिले पड़े थे. हमें तत्काल संस्कृत भाषी पंडितों की दूसरी जोड़ी के हवाले कर दिया गया. उन्होंने बताया कि आपसे बेटे की शादी के लिए 'अनापत्ति प्रमाणपत्र' माँगने के लिए कुछ रस्में की जायेंगी. कोई उनसे पूछे- भले आदमियों, पचास बारातियों को अड़तालीस घंटे की रेल तपस्या कराने के बाद क्या हम यह कहने को हाजिर हुए हैं कि हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं! अब जो नज़ारा नजरों के सामने था उसे देखने पर ऐसा मालूम होता था मानों अक्षय तृतीया पर जोड़ों का 'पेरेलल' में पाणिग्रहण चल रहा हो.

      फिर शुरू हुआ हमारी दुर्गति का असली सिलसिला. इस दुर्गति के दो तीन कारण थे...अव्वल तो बंद हॉल के अंदर लगातार मंगल-ध्वनि, उस पर हमारा जरा ऊँचा सुनना. दूसरे देवभाषा का हमारा कच्चा ज्ञान! तीसरी सबसे अहम् वजह जो थी, वो थी संस्कृत के मन्त्रों का तमिल बघार में हम तक पहुंचना. पर हम भी खाये-पिये थे. हमने बुदबुदा कर चकमा देने की वही स्ट्रेटेजी पकड़ी जो हम खुद के पाणिग्रहण में आजमा चुके थे. किन्तु यहाँ के पंडितजी बड़े चालाक निकले. प्रायमरी के किसी घाघ मास्टर की तरह वे अगले हरुफ़ पर तब तक नहीं पहुंचते, जब तक पिछला ठीक-ठीक नहीं बुलवा लिया जाता. इस दौरान हमसे क्या क्या हरकतें नहीं करवाई उन मरदूदों ने ! .... कभी वो हमसे कानों पर हाथ धरवाते, कभी हवा में सूत सा कतवाते. कभी उठक-बैठक लगवाते तो कभी दंडवत करवाते. मालूम होता था गोया पंडितों के चोगे में फायनल ईयर के सीनियर अपनी पूरी मंडली के साथ हमारी रेगिंग का मज़ा लूट रहे हों. मन में बारहा खयाल आता कि भाग खड़े हों, पर हनु के नुकसान की सोच कर रुक जाते. उधर लड़की के पिता भी अनजान बने बीच-बीच में कनखियों से हमारी दशा देख कर कुटिलता से मुस्कुरा देते. बचपन में पढ़ी लोमड़ी और सारस की कथा याद हो आई...समझ गए यह सारस का बदला है. सगाई के वक़्त फलौदा में जो गत हमने उनकी बनाई थी, उसी का फल गुरुवायूर में आज हम भुगत रहे हैं.

      सदया (केला पत्ता भोज) के ऐलान के साथ रस्में ख़त्म हुई, पर परीक्षा की घड़ियाँ अभी बाकी थीं. अपना तो सर ही चकरा गया जब सामने फैले केले के पत्ते पर कई कतारों में थोड़ी-थोड़ी दूर पर सैकड़ों नैवैद्यम की फसल सी पलक झपकते ही रोप दी गई. अब ठीक उसी पहेली की सी सूरत थी जिसमे बताना होता था कि भूल भुलैय्या के इधर खड़ी बकरी दूर किसी कोने में रखे घास के ढेर तक कैसे पहुंचेगी! समझ नहीं आ रहा था कि क्या खाया जाये, और जो खाया जाये वह कैसे खाया जाये. एक तरफ चटनी को सब्जी और सब्जी को चटनी समझने का पूरा खतरा था. तो दूसरी तरफ हलुवे को कढ़ी के साथ खाये जाते देख जगहंसाई का डर भी था. गनीमत ये रही कि हमारे बाजू में एक मल्लू भाई साहब आ बैठे. उन्हें देख-देख कर खाते हुए अपनी नैया भी वैसे ही पार लग गयी जैसे परीक्षा हॉल में होशियार बच्चे के ठीक पीछे बैठा बुद्धु बच्चा भी टीप टीप कर पास हो जाता है!