Saturday, April 19, 2014

जंगल में मोर नाचा


अंग्रेज चले गए,कमेटी छोड़ गये. एक जमाना था जब अंग्रेज नहीं थे. तब राजे थे, रजवाड़े थे, उनकी मर्ज़ी थी. इससे और पीछे चलें तो भगवान था. पत्ते तक इनसे पूछ कर ही खडका करते थे. आज कमेटी है. मजाल है जो कोई छोटा बड़ा काम बिना कमेटी बिठाये हो जाये. दरअसल कमेटी बड़े काम की चीज हैकमेटी की जादुई छड़ी के घुमाते  ही तानाशाही फैसले लोकतांत्रिक बन जाते हैं. जो आपको करना है, उसे खुद कर कमेटी से करवाओ. कमेटी के चश्मे से देखने पर आपकी मनमानी का भेड़िया लोगों को लोकमत का मेमना नजर आने लगेगा. लोकतंत्र में कोई बड़ा छोटा तो होता नहीं, जो आपका लिहाज़ कर चुप रहे. सो हमले लाजिमी हैं. ऐसे में कमेटी की ढाल को आगे बढ़ा कर आप पूरी तरह निरापद रह सकते हैं. कमेटी में एक और सिफ़त है. जब तक कमेटी है आपके राज-धर्म पर कोई उंगली नहीं उठा सकता. आप अंदर कमेटी की चादर तान कर मजे से सो सकते हैं. बस दफ़्तर के बाहर तख़्ती पर लिख छोड़ें- 'कमेटी चालू आहे'.

सवाल खड़ा होता है आखिर कमेटी है क्या? पांच सात भाई (एक दो कम ज्यादा भी चलेंगे) अथवा चार पांच भाई और एक दो बहनें यदि किसी पवित्र ध्येय से बैठतें हों, फिर-फिर बैठते हों, और इस अदा से बैठते हों कि फिर उठना भूल जाते हों, कमेटी कहलाते हैं. कमेटी का एक मुखिया होता है जो प्रायः संयोजक कहलाता है. संयोजक का काम आम तौर पर लोहे के चने चबाने जैसा होता है, एक आध अपवाद को छोड़ दें तो. मसलन, भरी दुपहरी में किसी वीरान खंडहर में तीन पत्ती  की बैठक जमाते जुआरियों के गिरोह का संयोजन. हाथों में खुजली होने के कारण संयोजक की एक पुकार पर पास पड़ोस के नौनिहाल हाथों के कौर थाली में छोड़ बैठक ज़माने के लिए झटपट घरों से निकल पड़ते हैं. किन्तु, बाकी किसी कमेटी का संयोजक इतना सौभाग्यशाली नहीं होता। उसे अमूमन जहाँ-तहाँ चर रही गायों को हेर कर मांद तक लाने, ग्वाले की तरह दुहने से पहले उन्हें घंटों पावसाने और दूध उत्सर्जित करने के लिए सभी थनों को तैयार करने जैसे अतीव धीरज और हुनर वाले काम अंजाम देने होते हैं

कमेटी बनाना एक हद दर्जे की ऊँची कला है जिसे सिद्ध करना हर किसी के बूते की बात नहीं हैकमेटी के सदस्य और संयोजक को चुनने में जरा भी ऊँच-नीच हुई तो अक्सर लेने के देने पड़  सकते हैं. इस काम में बहुत आगे का सोचना पड़ता है. अलबत्ता ऐसा होता नहीं, मगर फर्ज कीजिये कोई जांच कमेटी वाकई जांच कर दे, सच से पर्दा उठा दे तो यह कमेटी ही नहीं अपितु कमेटी के रचनाकारों का भी ठेठ निकम्मापन कहा जाएगा. अरे भाई, सच पर परदा  था ही कब? वह तो पहले ही बच्चे बच्चे की जबान पर था. और जो सबको मालूम था उसे बता कर कमेटी ने क्या ख़ाक दायित्व निभाया .  इससे बड़ा अनाड़ीपन भला और क्या  होगा अगर कोई कमेटी एक और कमेटी की गुंजाइश छोड़े, अपने ही साथियों के पेट पर लात मारे और कमेटी बनाने वाले अफसरों  का ही निवाला छीन ले? इसी तरह किसी कमेटी का रेगिंग की घटना को व्यापक छात्र हित में आपसी झगड़ा साबित ना कर पाना दरअसल कमेटी के गठन में हुई गंभीर त्रुटि की और इशारा करता है. ऐसी गलतियां बार-बार होने लगें तो समझो अफसरों को कुछ दिन छुट्टी देने का सही वक़्त गया. ताकि वे अरण्य प्रस्थान कर किसी योग्य कमेटी-गुरु के श्री चरणों में बैठ कर अपनी कमेटी निर्माण क्षमता का संवर्द्धन कर सके

जिधर भी निगाह उठाओ उधर ही मसले-मसले  कमेटी ऐसे बैठी मिलेंगी गोया फूल फूल भंवरे बैठे हों. बस फ़र्क इतना है कि भंवरों के बरक्स ये कमेटी कभी कभार ही उठती हैं. किसी मसले पर गुफ़्तगू को बैठी कोई कमेटी यदि उठ जाये और आप सोचें कि उठने के साथ ही मसले का कोई हल निकल आएगा, ऐसा नहीं होता . 
           सनम दिखलायेंगे राहे वफ़ा
           ऐसा नहीं होता 
           बंदगी से मिलेगा ख़ुदा 
           ऐसा नहीं होता 
           ये  जो  तुम  कहते  हो  
           कि सब हो चुका
           ऐसा नहीं होता 
कारण साफ़ है. यदि ऐसा हो जाये तो सन्देश जायेगा कि कमेटी से ज्यादा काबिल कोई है ही नहीं। यानि कमेटी से ऊपर के लोग काबिल ही नही. सो होता यह है कि कमेटी मसले पर अपनी तजवीज़ एक बड़ीऊंची और ज्यादा काबिल कमेटी को बैठने के लिए दे देती है. चंद दफ़ा यह बड़ीऊंची और काबिल कमेटी  बिना कायदे से बैठे एक दो उलटे-सीधे नुक्स निकाल कर मसौदा वापस पुरानी कमेटी को एक बार फिर बैठने का कह कर लौटा  देती है. वैसे ही, जैसे फाल्स स्टार्ट के बाद धावकों को फिर से स्टार्ट लाइन पर भेज दिया जाता है. मुद्दे का मुकद्दर ठीक रहा तो बड़ी, ऊंची और काबिल कमेटी पिछली कमेटी की रिपोर्ट बैठने लायक समझते हुए बैठी रहती है. इस दौरान मुद्दई को ज़ब्त कर बैठे रहने का नेक मशविरा दिया जाता है
         भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ 
         आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दआ 
मसलों के हिसाब से कमेटियां किसिम किसिम की होती हैं. इक्की दुक्की कमेटी इस कदर भारी भरकम होती है कि कामकाज निपटाना तो दूर ये अपना आपा ही ढंग से नहीं संभाल पाती. मुद्दे में मामूली सा गहरा उतर जाने पर इनके तत्काल धंस जाने का ख़तरा रहता है. ऐसी सूरत में इन्हे  गड्ढे में गिरे हाथी  की तरह फिर से बाहर निकाल कर खड़ा करना भारी पड़  जाता है. अतः यह ध्यान रखा जाता है कि इस तरह की कमेटी अपने कार्य काल में एक बार भी ना बैठ पाए. इसी में सबकी भलाई होती हैमगर कमेटी बिठा कर काम काज का हर्जाना तो किया नहीं जा सकता. लिहाज़ा सयानों द्वारा इसका तोड़ इस तरह निकाला जाता है. भीमकाय कमेटी के  बदले एक छोटे डील डौल वाली एक ऐसी कमेटी बनाई जाती है जिसमे मूल कमेटी की पूरी पावर कूट-कूट कर भर दी गयी हो. इसीलिए इसे अक्सर हाई पावर कमेटी या स्टेंडिंग कमेटी जैसे नामों से पुकारा जाता है. इस कमेटी को यह अख्तियार होता है कि वह जो भी फैसले ले, वे बड़ी कमेटी की तरफ से लिए गए फैसले मान लिए जाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे लाख पापड बेलने के बाद पकी उम्र में लड़की की शादी को भी परम पिता की असीम अनुकम्पा से आया हुआ प्रसंग मान लिया जाता है.

अपने लम्बे तजुर्बे से कई कमेटीबाज इस कदर खुर्रांट हो जाते हैं कि उन्हें इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि कमेटी का मकसद क्या है. बिलकुल उन पेशेवर गवाहों की तरह जिन्हें यह बताने की जरूरत नहीं होती कि मुक़दमा फौजदारी का है या दीवानी का. इन घाघ कमेटीबाजों को पता रहता है कि इन्हें क्या करना है- हाजिरी रजिस्टर पर सही करना, यात्रा भत्ता, बैठक शुल्क और स्व-अल्पाहार लेना तथा रिपोर्ट के आखिरी पन्ने पर नीचे चिड़िया बैठा देना। यदा कदा  कोई नादान कमेटीबाज भी टकर जाता है. गरूर खा कर जो सोचने लगता है कि अपनी सिफारिशों से वह दुनिया पलट देगा, भटकी हुई व्यवस्था की भैंस को रिपोर्ट के लट्ठ से सही रास्ते पर डाल देगा। जरूर....!  मगर रिपोर्ट लिफ़ाफ़े से बाहर आएगी, तब ना! वरना जंगल में मोर नाचा, किसने देखा?





Wednesday, April 9, 2014

कारोबार-ए-सेमीनार



(शेषशायी विष्णु और  ब्रह्मा-पुत्र नारद आकाश मार्ग से कहीं प्रस्थित)
( विष्णु नीचे देखते हुए, नारद से)

Ø  ये कौन सा देश है, मुनिवर?
आर्यवर्त मालूम होता है, प्रभु।

Ø  यहाँ तो कनातें तनी हैं, पकवानों की भीनी-भीनी खुशबू उड़ रही है। गहमा-गहमी भी ख़ासी नज़र आ रही है जैसे कोई उत्सव हो। क्या शादियों का सीज़न शुरू हो गया नारद?
      नहीं प्रभु, कार्यशालाओं/संगोष्ठियों का सीज़न खत्म होने को है।
Ø  समझे नहीं हम...तुम्हारा कहना है कि खाने पर कोई संगोष्ठी चल रही है!
      नहीं नारायण, नहीं।  यहाँ संगोष्ठी का खाना चल रहा है।
Ø  और उधर देखो। हवाई जहाजों से जो सूटेड बूटेड, हाथों में ब्रीफ़ केस लिए लोग उतर रहे हैं, वे कौन हैं, मुनिवर?
      वे स्रोत व्यक्ति हैं, भगवन।
Ø  स्रोत व्यक्ति क्या प्लेन से बुलवाने पड़ते हैं? अड़ोस-पड़ोस में नहीं मिलते?
      मिलते हैं भगवन, और इफ़रात में मिलते हैं। मगर जो जितनी दूर से आए वो उतना ही     पहुंचा हुआ स्रोत व्यक्ति माना जाता है। ठीक घर का जोगी जोगणा, बाहर का जोगी सिद्ध की तर्ज़ पर।
Ø  ऐसा क्यूँ भला? और ये व्यक्ति काहे के स्रोत होते हैं? क्या आय के?
      नहीं भगवन, ये व्यय के स्रोत होते हैं।
Ø  किन्तु कम दाम में काम हो तो ज्यादा दामों में कराना कहाँ की बुद्धिमानी है?
      है प्रभु, बिलकुल है! हाथ रोक कर खर्च करेंगे तो फंड कैसे ठिकाने लगाएंगे?
Ø  लेकिन फंड को क्यों ठिकाने लगाना, नारद?
      (मुसकुराते हुए) आप अंतर्यामी हैं प्रभु, फिर भी मुझसे पूछते हैं? आप तो जानते ही हैं      यह मार्च का महीना है और यह भी कि अप्रैल आते आते सब फंड लेप्स हो जाते हैं।
Ø  लेप्स माने?
      बताता हूँ, प्रभु। जैसे फलों को बहुत दिनों तक रखे रखो तो वे सड़ जाते हैं, खाने लायक    नहीं रहते। ठीक ऐसे ही फंड की मियाद मार्च तक होती है। मार्च खत्म नहीं हुआ कि सब सोना मिट्टी बन जाता है।
Ø  फिर?
      फिर क्या भगवन... फिर अप्रैल आ जाता है। अप्रैल के आते ही बाजार मुरझा जाते हैं।      बैठकें उठ जाती हैं। भट्टियाँ ठंडी पड़ जाती हैं। चलते चक्के जाम हो जाते हैं। चमकते बिल-बोर्ड बेवा की मांग की तरह सूने हो जाते हैं। मार्च के इश्क़ मे गिरफ्तार
      कई कारोबारी शायरी का धंधा पकड़ असली-नकली नामों से ग़ज़ल कहने लगते हैं। देखिये, फैज के छद्म नाम से एक व्यापारी द्वारा लिखी गयी मार्च को सदा देती हुई
      एक ग़ज़ल:
            गुलों में  रंग  भरे,  बादे  नौबहार   चले
            चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले....
Ø  बस भी करो नारद, तुम तो रूदाली ही गाने लगे। अच्छा ये बताओ सेमीनारों में खर्च के अलावा भी कुछ तो होता होगा न?
      नारायण... नारायण...! आप भी ठिठोली करते हैं प्रभु! सेमिनारों में बहुत कुछ होता है।      पेपर पढे जाते है, लेक्चर होते हैं, प्रशिक्षण होता है।
Ø  ठीक है, किन्तु इस से लाभ किसे मिलता है?
      आखिरकार तो विद्यार्थियों का ही भला होता है, तात।
Ø  किन्तु कब? हमें तो सब कक्षाएं खाली नज़र आ रही हैं! विद्यार्थी इधर-उधर भटक रहे हैं।
       क्या करें प्रभु, मजबूरी है, बड़ी भारी मजबूरी!
Ø  कैसी मजबूरी देव-ऋषि?
प्रभु, क्या है कि आधे शिक्षक प्रशिक्षण दे रहे हैं। बाकी के जो बचे, वे ले रहे हैं। ऐसे में आप ही बताएं कि पढ़ाये तो कौन?
Ø  अच्छा नारद, चलो देखें बंद कमरों के भीतर क्या चल रहा है?
       अंदर ज्ञान-मंथन चल रहा है, नारायण।
Ø  उत्तम! आओ, तनिक हम भी ज्ञान रस का पान करें।
(सेमीनार कक्ष में दबे पाँव प्रवेश। कोने की खाली सीट देख कर बैठते हैं।)
Ø  (कान में फुसफुसाते हुए) आप तो कह रहे थे ज्ञान-मंथन चल रहा है, मगर यहाँ तो आवागमन चल रहा है!
      माफ करें भगवन! इसे पृथ्वी-वासी वाचन कहते हैं...शोध पत्रों का वाचन!
Ø  ठीक है, पर वाचन ही कहाँ हो रहा है? ये तो तुरत-फुरत जहां-तहां पढ़ कर चलते बन रहे हैं।
      कुछ पढ़ तो रहे हैं, प्रभु। वरना शाम ढलते-ढलते तो कई शोध पत्रों को बिना वाचन ही      पढ़ा हुआ मान लिया जाएगा।
Ø  ऐसा क्यूँ नारद? यह तो अनीति हुई!
      अनीति नहीं प्रभु विवशता कहिए, विवशता!
Ø  वह कैसे नारद?
      क्योकि भगवन रजिस्ट्रेशन, उदघाटन, मिलन, भोजन, किराया-भत्ता वितरण और समापन     के सत्रों के बीच मंथन के लिए समय ही कहाँ बचता है?
Ø  किन्तु मंथन ही नहीं हुआ देव-ऋषि, तो सिद्धियाँ क्या मिली? समापन किस बात का?
      प्रमाणपत्र रूपी रत्नों का वितरण ही समापन है, भगवन।
      (इसी बीच मंच से लंच की घोषणा होती है)
Ø  चलो मुनिवर, उदर क्षुधा ही शांत कर ली जाए।
      हाँ प्रभु, भूख तो मुझे भी जोरों की लगी है।
Ø  (प्लेट वाले से) लाओ भाई, एक प्लेट इधर भी दो।
      पहले अपना कूपन दो।
Ø  कूपन? कूपन तो नहीं है।
      कूपन नहीं, तो भोजन भी नहीं। (डपटते हुए) लंगर समझा है क्या? चलो चलो रास्ता       नापो।

(दोनों मुंह लटकाए पुनः आकाश मार्ग पकड़ लेते हैं!)





     














Wednesday, March 26, 2014

बचना ऐ अदीबों, लो मैं आ गया...!!!

अपने कभी गौर किया कि शायर, कवि आदि किसी किसी मिसरे को छह-छह बार क्यों दोहराते हैं? यह मत सोचिए मैं छह-छह बार का कह कर कुछ ज्यादा ही हांक रहा हूँ! इसके उलट मेरी अर्ज़ है कि मैंने अपने पूरे होशो हवास में, जरूरी सतर्कता बरतते हुए ही किसी किसी मिसरे जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। वरना हकीकत तो यह है कि मुशायरों के कई महारथी अमूमन हर लाइन को चाहे वह मतला हो या मकता बाकायदा ताल ठोक ठोक कर इतनी बार दोहराते हैं कि श्रोताओं को मजबूरन एक ही ग़ज़ल की कई कई प्रतियाँ श्रव्यस्थ करनी पड़ जाती हैं। यही नहीं, कई कई ज़ालिम तो अर्ज़ किया है... की बंदिश से बाहर निकलने में अरसा छटपटाते रहते हैं। सुनने वाले लाख इरशाद इरशाद का ज़ोर क्यों न लगाते रहें, मजाल है जो ये मतले की डिलीवरी आसानी से सम्पन्न हो जाने दें।
श्रोताओं की तरफ से किसी शेर को फिर-फिर सुनाने की फरमाइश हो रही हो, या किसी पंक्ति पर भरपूर दाद मिल रही हो और शायर पेंदे तक की सारी दाद कबाड़ने कि जुगत में उसे दोहराता, तिहराता या चौहराता चला जाए तो बात फिर भी समझ में आती है। किन्तु एक बेदम और लचर शेर को बार बार सुनाने की करतूत को आप क्या कहेंगे? ...एक शातिर नटवरलाल का सभा को ठगने का मंसूबा या एक घटिया साबुन की बट्टी को जबर्दस्ती घिस घिस कर वाह-वाह रूपी झाग उड़ाने का हसीन सपना! यह तो आप ही जानें। जहां तक मेरा सवाल है मैं यह मानने को कतई तैयार नहीं कि जिन श्रोताओं को खुद शायर इस पल सुधि जन, गुणी जन और कद्र दान के खिताबों से नवाज़ रहा हो उन्हें ही अगले पल अदब के मदरसे में पढ़ रहे प्राइमरी के लौंडे समझ कर पाठ के घोटे लगवाना जरूरी समझता होगा।
यह समझना भी नादानी होगा कि शायर लोग सर्वोदयी किस्म के जीव होते हैं। जो अनटु दिस लास्ट की तर्ज़ पर श्रवण तंत्र या श्रवण यंत्र से बाधित अंतिम अर्द्ध श्रोता भी जब तलक कलाम को मुकम्मल ढंग से सुन समझ न ले तब तक सुनाते रहना अपना धर्म समझते हों। ऐसा तो नहीं कि सुनाने के लुत्फ़ मैं शायर इतने गहरे जा उतरता हो कि बेखुदी में उसे यह खयाल ही न रहे कि वह क्या और कितनी दफा कह रहा है! जी नहीं! नेताओं की कैमरे की भूख की तरह कवियों की तारीफ़ की भूख भी जग जाहिर है। सो, बेखुदी की बात हरगिज़ गले नहीं उतरती।

बचपन का एक सच्चा वाक़या याद आ रहा है जो इस शायराना लत की वजह पर शायद कुछ प्रकाश डाल सके। हिन्दी के मास्साब हमें घर से प्रेमचंद की जीवनी याद करके लाने को कहा करते थे। अगले दिन कक्षा के किसी बच्चे को खड़ा कर वे जीवनी सुनाने को बोलते। अमूमन पहला बच्चा इस तरह शुरू करता, मास्टरजी, प्रेमचंद का जन्म ग्राम... मास्टरजी, प्रेमचंद का जन्म ग्राम... मास्टरजी, प्रेमचंद का जन्म ग्राम...मास्टरजी...वह तब तक यह जुमला दोहराता जब तक उसे लमही याद न आ जाता। फिर वे दूसरे विद्यार्थी को खड़ा करते और आगे का सुनाने को कहते। फिर तीसरे को। सभी का कुछ कम कुछ ज्यादा यही हाल होता। इन प्रतिभाओं में से आगे चल कर जब तक कुछ शायर और कवि बनते तब तक उनकी यह आदत पक चुकी होती। ...और नतीजा आज हमारे आपके सामने है!!