Monday, June 8, 2015

बा-पटरी


['त्यागी उवाच' के तेवर से अलग  पेश है आज एक कविता]

कई दिनों बाद,
शाम भूख महसूस होने पर
भेल बनाई,
खाते-खाते टीवी पर
बकवास देखी.

          कई दिनों बाद,
          आज बालकनी से
          सूखे कपडे उतार कर
          तह किये.
          पौधों को
          कई दिनों बाद
          जी भर पानी दिया.

कई दिनों बाद,
सुबह-सुबह चाय पर
'भास्कर' और 'हिन्दू'
शब्द-शब्द चाट डाला.
नाश्ता कर चुकने पर  
थोड़ी देर
सुस्ताना भी हो गया.

          थाली में
          दाल रोटी समेत,
          कई दिनों बाद
          जो चीज घर में
          जहाँ हुआ करती थी
          उसी जगह लौट आई.

रात में
सोने से पहले आज
कई दिनों बाद,
तकिये के पास पड़े
'नया ज्ञानोदय' की
दो चार कहानियाँ तो
पक्का पढ़ मारूंगा.

           'रूटीन'
           सच में
           कितना अच्छा है!!


Saturday, May 16, 2015

गाइड की गत


वो हमें जांचने के लिए दी गयी थी. दी क्या गयी थी, इरादतन हमारी गैरहाजिरी में चुपके से फाइलों के ढेर में छोड़ दी गई थी...कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कोई बिन ब्याही माँ अपना पाप मुंह अँधेरे किसी घूरे पर फेंक आती है.

वो ड्राफ्ट थीसिस क्या थी, रुद्रप्रयाग की गंगा जी थी! दो रंगत की धाराएँ समेटे हुए. लिखे गए कुछ पैराग्राफ तो शीशे की तरह चमकदार थे. बेहद तराश  लिए, मचलती अलकनंदा की कलकल कर बहती हुई धारा की तरह. जिन्हें सरसरी तौर पर देखने से ही साफ नज़र आ जाता था कि इन्हें कहीं से उड़ाया गया है! वहीँ दूसरी तरफ भागीरथी की मंथर धारा थी....ठहरी-ठहरी, धूसर और मटमैली सी. यह हिस्सा पढ़ कर कोई सूरदास भी देख सकता था कि इसमें रत्ती भर की मिलावट नहीं है, यह सौ फ़ीसदी इनका स्वयं का पुरुषार्थ है. ऐसा कहने के पीछे एक ठोस कारण है.  दरअसल उनकी भाषा पर गौर करते ही प्रकट हो रहा था कि वह ठर्रा चढ़ाये हुए है और अपने होश हवास पूरी तरह खो बैठी है. चाहे पैर ऐंडे बेंडे पड रहे हों, मगर दुस्साहस से इतनी भरी हुई है कि अपने ही बनाये कायदे कानून तोडने पर उतारू हो जाये.

आगे पढते-पढ़ते आपको महसूस होता हैं कि शोधार्थी के अंदर चौसर और शेक्सपीयर दोनों की रूहें एक साथ प्रवेश कर गयी हैं. और ये रूहें उससे एक अनूठे किस्म के व्याकरण की इबारत लिखवा रही हैं. आइये एक नमूना दिखाएँ... वाक्य के अंदर कॉमा तथा सेंटेसों के बीच फुल स्टॉप तो दुनिया लगाती है. सो आपने लगा कर कौन से तीर मार लिए. मज़ा इस बात में है कि सेंटेंसों के बीच फुलस्टॉप, कॉमा आदि  की दीवार गिराते हुए उन्हें प्रेमी युगलों की तरह एक हो जाने दिया जाये. बांटने का काम तो दुनिया सदा करती आई है और करती रहेगी. इसके उलट, जोड़ने का काम किया जाये तो कुछ बात है! बस यही तुरपाई का काम उन्होंने जगह-जगह किया होता है. वैसे ऐसा लगता नहीं कि जाति तौर पर उन्हें फुल स्टॉप से कोई परहेज़ है. कई दफा सेंटेंस अगर कुछ ज्यादा ही लम्बा हुआ तो वे उसके ख़त्म होने का इन्तजार करते नहीं दीख पड़ते, बल्कि मंजिल से कोई आठ दस कदम पहले ही तम्बू (फुल स्टॉप) लगा कर बैठ जाते हैं.

आगे बढें तो और भी अजीबो गरीब नज़ारे नजर आने लगते हैं. कहीं पूर्ण विराम के बाद भी अक्षरों में इतनी जान नहीं आई होती कि वे तन कर चल सकें, जोड़ों के मरीज़ की तरह घिसटते से नहीं. तो कहीं शब्दों के कई पहले अक्षर कक्षा के उन बच्चों की तरह खड़े दिखाई देते हैं जो एक सिरफिरे शिक्षक के हाथों अकारण बेंचों पर खड़े होने की सजा भुगत रहे हों.  

सब जानते हैं कि भाषण देते वक़्त, वक्ता एक मर्तबा  बांये देखता है तो दूसरी मर्तबा दांये. वाहन भी अक्सर कभी फोर्थ गीयर में चलते हैं, कभी सेकेण्ड या थर्ड में. यहाँ तक कि भैंस भी कभी एक करवट बैठती है तो कभी दूसरी करवट. मगर एक अपने शोधार्थी मियां हैं जो एक बार लिखना शुरू करते हैं तो फिर उसी सुर ताल में, बिना सर ऊपर उठाए, लिखते चले जाते हैं. पैरा वैरा बदलने जैसा कोई फालतू रोग वे कतई नहीं पालते.

हाँ, इनमें एक सिफ़त है... जो भी इन्हें कहा जाता है सो ये झट कर डालते हैं. यह जरूर है कि करने के बाद कभी पलट कर नहीं देखते कि इन्होंने किया क्या है! कागजों का पुलिंदा गाइड के मत्थे मढने को वे उतने ही उतावले रहते हैं, जितना एक जवान लड़की का बाप लड़की के हाथ पीले कर गंगाजी नहाने के लिए होता है. 



ऐसी सूरत में गाइड की गत, गाइड जाने!!   

Monday, May 4, 2015

फोटो शूट



वे बहुत पहुंचे हुए थे. जिस पर उनकी कृपा होती उसकी जिंदगी ही बन जाती. बड़ी सिफारिशों के बाद मिलने का समय मिला. इन्हें लेकर पहुंचे तो डायरेक्टर नुमा अदा से रिवोल्विंग चेयर पर विराजे हुए थे. मिलते ही पूछा- कोई पुरानी फोटो लाये हो? हमने 'नहीं' कहा तो मन ही मन खुश नजर आये. मानो सोच रहे हों- एकदम रॉ है, बिलकुल फ्रेश मॉडल की तरह! दुनिया के सामने ला कर धमाका कर देंगें!

फिर हमें स्टूडियो भेज दिया गया. फोटोग्राफर ने बताया कि पहले बैठी मुद्रा में फोटो खींचेंगे. बोला- आप सामने की ओर पैर फैला कर बैठ जायें. 'ये पैर थोडा पीछे ले लें.' 'साड़ी पिंडलियों से ऊपर कर लें.' 'नहीं, नहीं, पैर अंदर की ओर मोड़ें.' 'हिलें नहीं, सीधे देखे.'....'बस एक मिनट.' 'ठीक!' इस तरह क्लैप शॉट ओके हो गया. ऐसा ही कुछ दूसरे पैर के साथ दोहराया गया. हमने सोचा बुद्धा मुद्रा अब ख़त्म हुई, अब विवेकानंद मुद्रा शुरू होगी. किन्तु हम गलत थे. उन्होंने अब दोनों पैर घुटनों तक मोड़ कर बैठने को कहा जैसे अक्सर लोग गमी में बैठते हैं. उसके बाद तो हद ही कर दी. पूरी जांघों तक स्ट्रिपटीज़ करा दिया. मुए ने पत्नी के बुढ़ापे की लाज तक नहीं रखी! खैर शरमा शरमी में शॉट जल्दी ओके हो गया.

अब वे अपना कैमरा उड़ा कर छत पर ले गए. फिर हुक्मनामा जारी किया- खड़े हो जाएँ. बायाँ पैर थोडा आगे, हाथ कमर पर, निगाहें सधी हुई. बचपन की सहेली की तरह स्टेच्यू बोल कर कैमरे की ओट  में जाकर प्रिव्यु देखने लगे. ओट से बाहर निकल कर सीन की सेटिंग बदली. पैर के नीचे कुशन का जैक लगा कर उसे बालिश्त भर ऊपर उठा दिया. आखिर काफी तकलीफ और थोड़ी जद्दोजहद के बाद यह शॉट भी ओके हो गया. फिर तो कैमरे की पोजीशन को लगातार बदलते हुए अलग-अलग पोज़ में न जाने कितने फोटो निकाल मारे.



खैर फोटो सेशन संपन्न हुआ. खींचे गए फोटो के नेगेटिव बारी-बारी और बारीकी से देखने के बाद डायरेक्टर उर्फ़ हड्डी-डॉक्टर ने भारी आवाज़ में फैसला सुना दिया. 'दोनों घुटने बुरी तरह घिस गए हैं....इन्हें बदलना ही इनका इलाज है.'     

Saturday, April 11, 2015

खोपड़ी रस

पहली कतार में बैठे लोगों के धड़ पूरी तरह सोफों में धंसे थे. जो हिस्सा नज़रों में आने लायक बचा था, वह उनकी खोपड़ियाँ ही थी. खोपड़ियाँ प्रौढ़ थीं, चंचला होती तो इधर उधर घूमती. इधर उधर घूमती तो आसानी से शिनाख्त में आ जाती. सभागार का मंच निपट ख़ाली था, बाँध कर नहीं रख सकता था. सो, खोपड़ी रस के आस्वादन के सिवाय कोई चारा न था.

किनारे वाली खोपड़ी का मुआयना करने पर लगता था कि वह जरूर किसी बड़े नेता की रही होगी. ऐसा मालूम होता था गोया हाल ही में विरोधियों के टोपी-रुपी चीरहरण के शिकार बनाये गए हों. कोस-कोस दूर तक उघडे इलाके पर दो बाल बड़े जतन से धरे हुए दिख रहे थे. ठीक वैसे ही जैसे कोई बेबस यौवांगना वहशी दरिंदों के सामने दोनों हाथों से अपनी इज्ज़त ढांपने की नाकाम कोशिश कर रही हो.

उसके बगल वाली खोपड़ी जो थी वह किसी धुरंधर भूगोल शास्त्री की लगती थी. किनारे-किनारे चलो तो डेल्टा के मैन्ग्रोव के जंगल जैसे दीखते थे  किन्तु बीचो-बीच का नज़ारा यूँ, जैसे लहलहाते रेगिस्तान में इक्का दुक्का झाड़ियाँ उग आयीं हों. आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो महसूस होता था मानों निर्जन स्थान पर कोई साधु अपना चिमटा गाड़ कर कहीं चला गया हो. अगली खोपड़ी किसी दर्शन शास्त्री की सी नज़र आ रही थी. इस कदर सुदर्शन, नरम गुदाज़ जैसे वसंती पात या किसी नवजात शिशु के कोमल गाल! डर था कि ज्यादा  देर देख लिया तो कहीं चूमने का मन ही ना करने लगे.

अब जो खोपड़ी नज़रों के सामने थी उस पर अल्लाह खूब मेहरबान था. बालों की छटा देखते ही बनती थी. मगर उन आला दर्जे के बालों का कालापन जरूरत से कुछ ज्यादा ही गहरा दीख रहा था. मानों कुदरत ने इनके लिए काली स्याही के ड्रम के ड्रम खोल दिए हों. कभी-कभी ऐसा भी शक़ होता था कि कहीं खास आज के जलसे की खातिर ही जम कर रंगाई पुताई ना कराई गयी हो!

कतार में लगी खोपड़ियों में एक खोपड़ी बड़ी हिमाकती भी थी. बाले-बाले अभी सर पर एक रुपये के सिक्के के बराबर भी जगह खाली नहीं हो पाई थी और महाशय निकल पड़े थे पहली कतार में बैठने! आसपास की सभी पकी खोपड़ियाँ  उसकी खिल्ली सी उड़ाती दिख रही थीं. मानों धिक्कारती हुई कह रही हों, "जरा औकात में रह, सींकिया पहलवान! अभी आठ दस साल और दंड पेल, तब जाकर कहीं हमारे बराबर में खड़े होने की सोचना."

कतार में दो एक खोपड़ियाँ ऐसी भी थी जो दृश्यमान नहीं थी, पोशीदा थी. उनके चोले या बाने को देख कर उनकी मौजूदगी का अहसास जरूर होता था. पर इन खोपड़ियों के नीचे जड़े धडों में जवां दिल धड़क रहा था कि बुजुर्ग, इसकी तस्दीक करने का कोई जरिया नहीं था. न इनके जुगराफिये का पता लग सकता था और न ही तारीख के इनके ऊपर छोड़े गए निशानों का. ये बरमूडा ट्रायएंगल की तरह रहस्यमयी थी. सो इनके बारे में मुकम्मल तौर पर कुछ भी कहना मुमकिन नहीं था. हम इनका तिलस्सिम तोड़ने का जुगाड़ कर ही रहे थे कि अचानक रंग में भंग पड़ने से खोपड़ी रस बे मज़ा हो गया.


हुआ यूँ कि उद्घोषिका की घोषणा के साथ ही अतिथि गण मंच पर पधार गए. 

Friday, February 6, 2015

कुहरे का कहर- उर्फ़ पहली कसम


कल घडी के काँटों के साथ बढ़िया रेस खिली. ९:२० पर दिल्ली के एयरपोर्ट पर उतर कर नयी दिल्ली से १३:५५ पर छूटने वाली कटिहार की राजधानी पकडनी थी. यही कोई साढ़े चार घंटे थे हाथ में. किन्तु इंदौर से टेक ऑफ ही १२:२० पर हुआ, लेंडिंग डेढ़ बजे. ट्रेन मिलने की उम्मीद छोड़ी नहीं थी. आखिर कुहरे की कोई फ्लाईट से ही दुश्मनी तो थी नहीं, राजधानी भी तो लेट हो सकती थी! एयरपोर्ट से नयी दिल्ली की मेट्रो पकड़ी ही थी कि खबर मिली कि राजधानी छूटे हुए पाच मिनट से ऊपर हो चुके हैं. ऐसा लगा जैसे विदेशी धरती पर टीम इंडिया एक बार फिर जीतते-जीतते रह गयी हो.

बेटे को फोन कर अगले दिन पटना की फ्लाईट बुक करायी. सुबह दिल्ली के गुलाबी बाग़ से जब निकले तो हल्का कुहरा नज़र आ रहा था. मेट्रो स्टेशन पहुंचते-पहुंचते यह कैंसर की तरह सब तरफ फैल चुका था. एयरोसिटी स्टेशन से टर्मिनल १ की तरफ जाते-जाते तो इसने विकराल रूप धर लिया था. दिन ज्यूँ-ज्यूँ चढ़ता गया, कोहरा त्यूं-त्यूं गहराता गया. लगा 'दर्द बढ़ता गया, ज्यूँ-ज्यूँ दवा की' लिखने की प्रेरणा मोमिन को जरूर दिल्ली के कुहरे से ही मिली होगी. संतों की वाणी याद आई. जहाँ "मैं" है, "तू" नहीं है. "तू" है, वहाँ "मैं" नहीं है. कोई एक ही हो सकता है. पहली बार आज इसका मर्म समझ में आया. यही- कि धुंध है तो जग नहीं, जग है तो धुंध नहीं. ता में दुई ना समाहीं. ख़याल आया जैसे बर्फ़ काट कर सड़क खोल देते हैं, ऐसे ही धुंध काट कर रन वे खोलने की मशीन कहीं तो जरूर होती होगी!

वेटिंग लाउंज में बैठे बाहर कोहरे पर नजर गडाये बचपन के दिन याद आ रहे हैं. थोड़े बड़े हुए ही थे कि इंटर कालेज में बड़ों की सोहबत का असर पड़ना शुरू हो गया था. गर्मियों के दिनों में अक्सर रोटी-अचार-गंठा लेकर घर से निकलते. मगर स्कूल नहीं पहुँचते. बरला गाँव के ठीक पहले  पड़ने वाली गरभी (छोटी नहर) में डुबकियाँ लगा कर बालू में लोट रोटी-अचार-गंठा खाते और घर लोट आते.

मालूम होता है आज वही इतिहास दोहराया जायेगा. भतीजी के बाँध कर दिए गए परांठे खा कर वापस घर जाना पड़ेगा. 'तीसरी कसम' के 'हीरामन' की तरह इस पहली कसम के साथ:

      कुछ हो जाये आइन्दा जनवरी के महीने में कभी उत्तर भारत का रुख नहीं करेंगे!!  

Monday, January 19, 2015

किश्तों में ख़ुदकुशी: ब्लॉगर भाई बेचैन आत्मा को समर्पित पोस्ट


कटिहार तक ठीक ठाक आई थी. किन्तु स्टेशन पर खड़े-खड़े ही दस मिनट लेट हो गयी. इसके बाद तो इसे लेट होने में मजा सा आने लगा. यहाँ तक कि इलाहाबाद आते-आते यह तीन घंटे से ज्यादा देरी से चल रही थी. हर ऐरी-गैरी सवारी गाड़ी/मालगाड़ी इसे लतियाती हुई वैसे ही आगे निकल रही थी जैसे कमजोरों को धकिया कर हट्टे-कट्टे लोग लाइन में आगे बढ़ जाते हैं. दूर-दूर तक पटरियां खाली हैं, कहीं कोई ट्रैफिक जाम नहीं, फिर भी जाने क्यूँ बारात की घोड़ी सी घडी-घडी खड़ी हो जाती है. कभी ज्यादा तबियत से चलती भी है तो ऐसे जैसे पुराने मॉडल का लम्ब्रेटा पहाड़ पर चढ़ रहा हो, मगर रुकती है तो यूँ गोया अब कहीं जाना ही न हो. कहने को पूर्वोत्तर क्रांति है मगर दो कदम चलने पर ही दम फूल जाता है, किसी दिल के मरीज़ की तरह. जिस गाड़ी को सराय रोहिल्ला से मिन्टो ब्रिज तक चलाना था न जाने किस खब्ती ने उसे गौहाटी-दिल्ली रूट पर लगा दिया. अभी-अभी अच्छी भली चल रही है. अचानक चलते-चलते बियाबान में खड़े होकर न जाने क्या सोचने लगती है. शायद सोचती हो कि अगर इस जगह चौराहा होता तो किधर जाती. रेलवे वाले मिलें तो एक बात पूछें. आखिर उधर से आने वाली हर गाड़ी क्या ओबामा की 'बीस्ट' है जो हमें रोक कर उस मरदूद को निकाले जा रहे हो!

अँधेरे में खड़ी है. बेटे ने नेट पर देख कर बताया, कहाँ खड़ी है. पहुँचना दोपहर एक बजे था किन्तु रेलवे साइट पहुँचने का समय साढ़े चार दिखा रही है. फिर साढ़े आठ, दस, साढ़े बारह, सुबह के ढाई, ....गोया

          ये जिंदगी एक मुसलसल सफ़र है
          मंजिल पे पहुंचा तो मंजिल बढ़ा दी

सुना था, जो होता है वह पहले से तय होता है. ऐसा है तो फिर इस गाड़ी का दिल्ली पहुँचना भी जरूर तय होगा. है कोई माई का लाल- कोई मुल्ला, कोई पंडित, कोई सूझा, कोई ज्योतिषी जो अपनी पोथी बांच कर एक-मुश्त बता सके कि आखिर यह गाड़ी दिल्ली प्लेटफार्म पर कब जा कर लगेगी!! ये बंदा उसकी टांग के नीचे से निकलने को तैयार है. आज की फ्लाईट छूटी तो छूटी, अब डर इस बात का है कि कहीं कल शाम की भी ना छूट जाये!

कोई एक सौ छप्पन बार रुक चुकी है कानपुर से चल कर. अभी टुंडला भी नहीं आया. ऐसा लगता  है मानों इसके चक्के ठण्ड से जकड गए हों, या फिर चलना भूल गए हों....फिर ठहरी हुई है. अब तो आजिज़ ही आ गया हूँ. दिल करता है गाड़ी से ही कट मरुँ, झंझट ख़त्म हो! किन्तु ऐन वक्त ससुरी फिर खड़ी हो गयी तो!!!

 शायद 'खुमार बाराबंकवी' साहब इसे ही कहते हैं किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा!! 
    


Thursday, December 18, 2014

सन्डे मैच [‘त्यागी उवाच’ ब्लॉग की सेंचूरियन पोस्ट]

यह क्रिकेट मैच न टी-ट्वेंटी है न वन-डे है, बल्कि सन्डे है. इसे फुटबाल के आधे मैदान पर ब्रेकफास्ट से पहले खेला जाता है. पूरे मैदान के चारों तरफ चक्कर लगा रहे सुबह की सैर करने वाले बुजुर्ग अथवा मैदान के दूसरे आधे हिस्से में खेले जा रहे मैच के खिलाडी इसके दर्शक होते हैं. सन्डे मैच में दोनों टीमों को मिला कर भी ग्यारह खिलाडी हो जाएँ तो बहुत माने जाते हैं. आम तौर पर खिलाडी खेल के जरूरी सामान के अलावा अम्पायर लेकर घर से नहीं निकलते. मैदान पर ही अम्पायर का बंदोबस्त हो भी जाये तो लोकसभा के सभापति की तरह उसकी कोई नहीं सुनता. टीम में खिलाडी चुनने समेत सारे फैसले शोर-शराबे अर्थात ध्वनि मत से ले लिए जाते हैं. बल्लेबाजी का क्रम अक्सर बाजुओं के बल के आधार पर तय होता है और गेंदबाजी उस जांबाज को नसीब हो पाती है जो छीना-झपटी की कला में पारंगत हो. यही वजह है कि टीम में कप्तान के लिए कोई खास काम नहीं बचता.

खिलाडियों के टोटे के चलते कोई टीम स्लिप पर खिलाडी तैनात करने का नहीं सोच सकती. हाँ, विकेटों के पीछे एक विकेटकीपर और उसके ठीक पीछे एक और बेकअप विकेटकीपर जरूर लगाया जाता है. ध्यान से देखो तो पता चलता है कि प्रमुख विकेटकीपर का मुख्य काम बैकअप विकेटकीपर के लिए गेंदों को छोड़ना होता है. ठीक वैसे ही जैसे दफ्तर के बॉस का प्रमुख काम बाबुओं को काम सौंपना होता है. इन मैचों में हो सकता है मिड-विकेट हो ही ना, वरन उसकी जगह थ्री-फोर्थ विकेट हो. डीप थर्ड मैन या लॉन्ग ऑन पर खड़ा खिलाडी फील्डिंग कम और वाट्स एप ज्यादा करता देखा जा सकता है. इस खेल में बल्ले के प्रहार से निकली गेंद के पीछे आजू-बाजू के फील्डर नहीं भागते, बल्कि हाथ उठा कर यह बताते हैं कि किसे भागना था! जब तक यह तय हो कि फील्डिंग किसकी थी तब तक गेंद सीमा रेखा के बाहर चली जाती है. ठीक उसी तरह जैसे सम्बंधित थाने जब तक यह तय करें कि वारदात किसके क्षेत्र में हुई थी तब तक लुटेरे शहर छोड़ चुके होते हैं. यहाँ किसी फील्डर द्वारा कैच टपकाए जाने को पिछली दफा उसकी गेंद पर बॉलर खिलाडी द्वारा टपकाए गए कैच का बदला मान लिया जाता है. जिसका कोई खास बुरा भी नहीं माना जाता. 

बल्लेबाजी अमूमन एक ही छोर पर की जाती है. दूसरे छोर पर वैसे की भी नहीं जा सकती. क्योंकि उस छोर पर न तो विकेट होती हैं न ही बल्लेबाज के हाथ में कोई बल्ला. रन आउट वगैरह के लिए डंडों की जगह चप्पल आदि बिखरा कर काम चला लिया जाता है. यूँ एक रन लेने से बचा ही जाता है. कारण कि रन लेने के बाद स्ट्राइकर एंड पर पहुंचे बल्लेबाज को चल कर बल्ला देने जाना होता है. सो कौन जहमत उठाये? इस प्रकार के मैच में जीत या हार होने की नौबत के आने से पहले ही झगडा हो जाया करता है. झगडा न भी हो तो बारी की इंतज़ार कर रहे बड़ी उम्र के खिलाडियों द्वारा धोंस-पट्टी देकर मैदान को खाली करा लिया जाता है. इस तरह मैच बे-नतीजा समाप्त हो जाता है. लेकिन मजेदार बात यह है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी टीम को विजेता मान हंसी-ख़ुशी घर लौटते हैं. विन-विन सिचुएशन, मैच में पिछड रही टीम के लिए भी! क्यूँकि जिस तरह लेट चल रही भारतीय रेलें समय बना कर सही समय पर भी पहुँच सकती हैं, उसी तर्ज़ पर सोचा जाता है कि फिसड्डी टीम बचे हुए समय में तेजी से रन बना कर जीत भी सकती थी!!