Monday, September 7, 2015

कल के व्यापमं


 आप हमारे होनहारों के निर्माता हैं... भारत के भावी शिक्षक! अगली पीढ़ी आपके हाथों में सुरक्षित है, जो देश को बहुत आगे ले जाएगी. इतने ऊंचे शिखर पर जिसके सामने आज का व्यापमं भी शर्म के मारे धरती में गड जाये. इन भावी शिक्षकों से कुछ मुठभेड़ों (गौरतलब है कि फर्जी मुठभेड़ नहीं!) का सौभाग्य इस खादिम को भी प्राप्त हुआ, जो आपकी खिदमत में पेश है-

(एक)

भावी शिक्षक (प्रिंसिपल से फोन पर)- सार, हमें बी.एड. के बारे में कुछ इन्क्वायरी कोरना.

प्रिंसिपल- जी करें.

भावी शिक्षक- सार, हम दो सेमेस्टर एक साथ कोर सकते?

प्रिंसिपल (सकते में!)- दो क्यों....आप चारों सेमेस्टर एक साथ कोर सकते!

भावी शिक्षक (कुछ खिसियाते हुए)- वो क्या है कि सार, हमारी तोबियत ख़राब है.

प्रिंसिपल- आपको पूरा कॉन्फिडेंस है कि साल भर ख़राब ही चलेगी?...अरे, आज ख़राब है
     तो कल ठीक हो जाएगी!

भावी शिक्षक- लेकिन सार, हम इतनी दूर रहते...क्लास नहीं कोर सकते.

प्रिंसिपल- क्यूँ नहीं कर सकते? आई.आई.टी., आई.आई.एम. में देश के कोने-कोने से बच्चे पढने जाते हैं....लोग यू.एस., यू.के. तक पढने चले जाते हैं... फिर आप   यहाँ क्यूँ नहीं आ सकते?

भावी शिक्षक- सार, हम नौकरी भी कोरते हैं ना!

प्रिंसिपल- फिर तो ऐसा करो कोई फर्ज़ी डिग्री बनाने वाला गिरोह ढूंढो. दो चार लाख दो, घर बैठे डिग्री ले लो. (उधर से फोन कट जाता है!)

(दो)

(बी.एड. के वैकल्पिक विषय का पेपर. परीक्षा शुरू होने का समय. एक भावी शिक्षक हडबडाया हुआ परीक्षा केंद्र में घुसता है.) 

भावी शिक्षक (अधीक्षक से)- सर, मेरा रोल नंबर नहीं मिल रहा.

अधीक्षक- अपना एडमिट कार्ड दिखाओ जरा! (देखते हुए) केंद्र तो यही है. आपने सीटिंग प्लान ध्यान से देखा?

भावी शिक्षक- जी सर, कई बार देखा...मेरा रोल नंबर कहीं नहीं है.

अधीक्षक (सहायक से)- देखिये जरा, इनका रोल नंबर किस कमरे में है?

सहायक- देख लिया सर, किसी कमरे में नहीं है!

भावी शिक्षक- जल्दी करो सर, मेरा पेपर छूट जायेगा...

अधीक्षक (परीक्षा फॉर्म देखते हुए)- लो, तुम्हारा तो आज पेपर ही नहीं है!...आज शैक्षिक तकनीकी का है. शैक्षिक प्रशासन का 26 को है. आप गलत दिन आ गए!

भावी शिक्षक- नहीं सर, मेरा शैक्षिक तकनीकी ही है...शैक्षिक प्रशासन गलती से लिखा गया होगा.

अधीक्षक- ऐसा कैसे गलती से लिखा गया होगा!...परीक्षा फॉर्म तुमने नहीं भरा क्या?

भावी शिक्षक- नहीं सर, एजेंट ने भरा था.

अधीक्षक- और हस्ताक्षर?...वो भी उसी ने किये थे क्या?

भावी शिक्षक- जी सर!!!

(तीन)

(नवप्रवेशित एम. एड. विद्यार्थियों की पहली क्लास)

प्रोफ़ेसर (भावी शिक्षकों से)- आप सबने बी.एड पास किया है. आपमें से कोई ऐसा है, जिसे यह भी पता न हो कि उसका बी.एड. कॉलेज किस दिशा में है?

           (एक-दो हाथ खड़े होते हैं)

प्रोफ़ेसर- शाबाश! आपकी ईमानदारी के सदके!!

प्रोफ़ेसर (बचे हुए भावी शिक्षकों से)- अच्छा, आप बताएँगे, कितने दिन कॉलेज गए होंगे, आप लोग साल भर में?

एक भावी शिक्षक- सर, हम तो रोज़ जाते थे.

प्रोफ़ेसर- बहुत बढ़िया! कितने स्टूडेंट होते होंगे क्लास में अमूमन, हर रोज़?

भावी शिक्षक- हर रोज़ तो पांच सात ही आते थे, सर.

प्रोफ़ेसर- सौ में से?... और बाकी?

भावी शिक्षक- बाकियों को फोन कर टेस्ट वाले दिन बुलवा लिया जाता था!!

(चार)

भावी शिक्षक (फोन पर)- सर, आपके यहाँ एम. एड. में एडमिशन चालू है?

शिक्षक- नहीं, एडमिशन तो कब के ख़त्म हो चुके...अब तो कक्षाएं चल रहीं हैं.

भावी शिक्षक- तो क्या अब नहीं हो सकता?

शिक्षक- अब कैसे होगा?...कुछ ही दिनों में पहला टेस्ट होने वाला है.

भावी शिक्षक- वैसे आपके यहाँ एम. एड. कितने साल का है, सर?

शिक्षक- दो साल का...2015 से पूरे हिंदुस्तान में दो साल का ही है!

भावी शिक्षक- तो क्या एक साल वाला अब नहीं है?

शिक्षक- मुझे दो साल का मालूम है. NCTE ने इस वर्ष से दो साल का कर दिया है.

भावी शिक्षक- किन्तु हमने सुना है कि 2014-15 के एडमिशन हो रहे हैं.

शिक्षक- भई, जुलाई 2015 ख़त्म होने को है. 2015-16 की पढाई चल रही है. 2014-15 के एडमिशन अब कहाँ से होंगे?

भावी शिक्षक- हमें किसी ने बताया है, तभी हम पूछ रहे हैं.

शिक्षक- तो जिसने बताया है, उसी से पूछो. वही शायद बता पाए!
         (फोन काट देते हैं)

(पांच)

प्राचार्य- आओ, आओ, कहो कहीं पढ़ा रही हो?

भावी शिक्षक (पैर छूते हुए)- जी सर, आपके आशीर्वाद से.

प्राचार्य- किस कॉलेज में?

भावी शिक्षक- सेंट अम्बर टीचर ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट में सर.

प्राचार्य- मगर यह तो अलीराजपुर में है. वहीँ रहने लगी हो या डेली अप-डाउन करती हो?

भावी शिक्षक- नहीं सर, क्लासेस यहीं लगती हैं!

प्राचार्य- हें!!


Wednesday, August 12, 2015

तीसरे सुधारों की ओर

हमारे देश में सुधारों की एक लम्बी और गौरवशाली परंपरा रही है. उन्नीसवी सदी के आखिर में हमने धर्म को सुधारने का काम किया. जब धर्म सुधर गया तो बीसवीं सदी में हम आर्थिक सुधारों पर पिल पड़े. इसके चलते देश में बोफोर्स, आदर्श, थ्रीजी और व्यापमं जैस अनेक मानक स्थापित किये गए. यहाँ तक कि शिक्षा और चिकित्सा जैसे शुद्ध सेवा क्षेत्रों में भी देखते-देखते कई अभूतपूर्व सुधार कर दिए गए. और तो और दुकान बढ़ा चुके कारोबारियों की भी कई पुश्तें तर गईं. लेकिन इन सुधारों में देश कब तक मगन रहेगा? देश को अब तीसरे सुधारों की तत्काल जरूरत है.


यह भारत का सौभाग्य ही था जो मेमन की फांसी ने इसे तीसरे ऐतिहासिक सुधारों के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया. कुछ कानून छांटने वालों को कहीं से दिव्य दृष्टि हासिल हुई, जिसकी कृपा से उन्हें मृत्युदंड के पुराने फैसलों में बड़ी-बड़ी गलतियाँ दिखाई देने लगी. मर चुके व्यक्ति को दुबारा जिन्दा कर गलतियाँ सुधारना किसी के बस में नहीं. मगर फांसी की सजा ख़त्म करना तो बस में है. दुनिया के कई देश मौत की सज़ा पर रोक लगा कर कब के सुधर चुके हैं. अब हमारी बारी है. हमें कानून की किताबों से मौत की सजा वाला पन्ना फाड़ कर तुरंत सुधरना होगा.


सिर्फ फांसी पर रोक लगाने से कानूनी सुधारों को पूरा कर लेना भारत जैसे विशाल देश के लिए शर्म की बात होगी. सो जहाँ-जहाँ, जिस-जिस क्षेत्र में फांसिया लग रही हैं या लगवाई  जा रही हैं, हमें उन सभी क्षेत्रों में सुधार करना होगा. अब पुलिस महकमे को ही ले. आये दिन किसी न किसी पुलिसिये की थाने में फांसी लगा लेने की खबर अख़बार में पढ़ने को मिल जाती है. ऐसा किसी न किसी की गलती से ही होता है. देश में अपराध बढ़ रहे हैं. मुट्ठी भर पुलिस वाले भला कहाँ-कहाँ, किसे-किसे पकड़ें? इसी दबाव के चलते उन्हें आत्महत्या को मजबूर होना पड़ता है. इससे उबरने का एक ही उपाय है- कानूनी सुधार. कातिलों को पकड़ने के लिए इन्हें आज़ादी देनी होगी. इन्डियन पेनल कोड में ऐसे सुधार किये जाएँ कि वे किसी शरीफ़ को सोते से उठा कर उससे कत्ल कबूल करवा सकें. उधर कई पुलिस कप्तान अपनी जान पर खेल कर अपराधियों को पकड़ भी लेते हैं. किन्तु गवाहों के पलटने, वकीलों के दाँव-पेंच और अदालतों की लेटलतीफी से उन्हें सजा नहीं दिलवा पाते. लिहाज़ा, नामर्दगी के ठप्पे के डर से खुद की कनपटी पर लबलबी दबा बैठते हैं. हमें पुलिस प्रणाली में सुधार कर उन्हें अधिकार संपन्न बनाना होगा. जिससे वे गर्ल-फ्रेंड के साथ सैर सपाटे को निकले युगल को आतंकवादी समझ उनका एनकाउंटर कर ख़ुदकुशी से बच सकें. आखिर लाख दो लाख का मुआवज़ा मिलने से उनके अनाथ परिवारों के साथ न्याय थोड़े ही हो सकता है!


साहित्य के क्षेत्र में भी सुधारों की भारी जरूरत है. अगर देश की सर्वोच्च न्यायालय की खंड पीठ से गलती हो सकती है तो एक अदद संपादक/ उपसंपादक अपनी विवेकहीनता से रचना को रद्दी की टोकरी में क्यों नहीं फेंक सकता! रचना की अस्वीकृति उभरते हुए लेखक के लिए किसी फांसी से कम नहीं होती. युवा लेखकों की रचनाएँ नामंजूर कर उनके अदबी सफ़र का बेवक्त खात्मा करना किसी युवती को भरी जवानी विधवा करने जैसा जुर्म है. हमें यह बर्बर प्रथा तत्काल ख़त्म कर सुधरना होगा. रचनाओं को पहले पाओ, पहले छापो के आधार पर स्वीकृत कर संपादकों की गलती से काफी हद तक बचा जा सकता है. इस फैसले से हम सुधारों की तरफ एक मजबूत कदम बढ़ा सकेंगे.


एक शिक्षक होने के नाते मेरा मानना है कि अगर सुधारों की कहीं सबसे ज्यादा जरूरत है, तो वह शिक्षा के क्षेत्र में है. परीक्षाओं में फेल होकर स्कूल/ कालिजों के पढाकों का पंखे से झूल जाना आज आम बात है. गुणीजनों का कहना है, टीचरों के गलत कापियां जांचने के कारण ही ऐसा होता है. लिहाज़ा हर साल न जाने कितनी राष्ट्रीय प्रतिभाएं अपनी जान से हाथ धो बैठती हैं. भले ही कुछ लोग शक करें, किन्तु शिक्षक भी आखिर है तो इंसान ही! इंसान हैं तो गलतियाँ भी होंगी ही. मतलब... सुधार हो ही नहीं सकता? बिलकुल हो सकता है! इस मामले में हम खुदा से बहुत कुछ सीख सकते है. यह ईश्वर ही है जो कभी कोई गलती नहीं करता. क्यूंकि कुछ करता ही नहीं, तो गलती क्या करेगा? वह तो अकर्ता है!! बस यही वह सूत्र है जिसे पकड़ कर अर्थात शिक्षक को अकर्ता बना कर, सुधार की तरफ बढ़ा जा सकता है. वह पेपर ही सेट न करे, वीक्षकीय कार्य ही न करे, कापियां ही न जांचे, तो गलतियाँ कहाँ से होंगी? दरअसल हो यह कि परीक्षाएं ही ना हों. बस सारा टंटा अपने आप ख़त्म! छः माह की मियाद पूरी होते ही विद्यार्थी खुद-ब-खुद अगले सेमेस्टर में पहुँच जाये. कोर्स की अवधि ख़त्म होते ही उन्हें सनद/डिग्रियां बाँट दी जाएँ. सब कुछ समयबद्ध हो. ठीक वैसे ही जैसे बिना परीक्षा कुछ सालों बाद आप बचपन से जवानी में पहुँच जाते हैं. एक तय उम्र में शादी कर, माँ-बाप, फिर दादा-दादी का पद प्राप्त करते हुए एक दिन टपक जाते हैं. परीक्षाएं होती तो बहुतेरे बचपन में ही पड़े सड़ते रहते, कईयों की शादियाँ ही न हुई होती! यूँ देखा जाये तो रहीमदास जी बहुत पहले इन सुधारों का आग़ाज़ कर चुके हैं, जब वे कहते हैं:


              समय पाय फल होत हैं, समय पाय झर जाय      

              सदा रहे  नहिं  एक सा, का  रहीम  पछताय    

बाकी बचे तमाम क्षेत्रों में सुधार के लिए मैं माननीय प्रधानमंत्री जी का आह्वान करूँगा कि वे शीघ्र ही एक 'राष्ट्रीय सुधार आयोग' का गठन करें. यदि वे जोर देंगें तो मैं इसका अध्यक्ष पद सम्भालने पर भी राजी हो सकता हूँ.   

Monday, June 8, 2015

बा-पटरी


['त्यागी उवाच' के तेवर से अलग  पेश है आज एक कविता]

कई दिनों बाद,
शाम भूख महसूस होने पर
भेल बनाई,
खाते-खाते टीवी पर
बकवास देखी.

          कई दिनों बाद,
          आज बालकनी से
          सूखे कपडे उतार कर
          तह किये.
          पौधों को
          कई दिनों बाद
          जी भर पानी दिया.

कई दिनों बाद,
सुबह-सुबह चाय पर
'भास्कर' और 'हिन्दू'
शब्द-शब्द चाट डाला.
नाश्ता कर चुकने पर  
थोड़ी देर
सुस्ताना भी हो गया.

          थाली में
          दाल रोटी समेत,
          कई दिनों बाद
          जो चीज घर में
          जहाँ हुआ करती थी
          उसी जगह लौट आई.

रात में
सोने से पहले आज
कई दिनों बाद,
तकिये के पास पड़े
'नया ज्ञानोदय' की
दो चार कहानियाँ तो
पक्का पढ़ मारूंगा.

           'रूटीन'
           सच में
           कितना अच्छा है!!


Saturday, May 16, 2015

गाइड की गत


वो हमें जांचने के लिए दी गयी थी. दी क्या गयी थी, इरादतन हमारी गैरहाजिरी में चुपके से फाइलों के ढेर में छोड़ दी गई थी...कुछ-कुछ वैसे ही जैसे कोई बिन ब्याही माँ अपना पाप मुंह अँधेरे किसी घूरे पर फेंक आती है.

वो ड्राफ्ट थीसिस क्या थी, रुद्रप्रयाग की गंगा जी थी! दो रंगत की धाराएँ समेटे हुए. लिखे गए कुछ पैराग्राफ तो शीशे की तरह चमकदार थे. बेहद तराश  लिए, मचलती अलकनंदा की कलकल कर बहती हुई धारा की तरह. जिन्हें सरसरी तौर पर देखने से ही साफ नज़र आ जाता था कि इन्हें कहीं से उड़ाया गया है! वहीँ दूसरी तरफ भागीरथी की मंथर धारा थी....ठहरी-ठहरी, धूसर और मटमैली सी. यह हिस्सा पढ़ कर कोई सूरदास भी देख सकता था कि इसमें रत्ती भर की मिलावट नहीं है, यह सौ फ़ीसदी इनका स्वयं का पुरुषार्थ है. ऐसा कहने के पीछे एक ठोस कारण है.  दरअसल उनकी भाषा पर गौर करते ही प्रकट हो रहा था कि वह ठर्रा चढ़ाये हुए है और अपने होश हवास पूरी तरह खो बैठी है. चाहे पैर ऐंडे बेंडे पड रहे हों, मगर दुस्साहस से इतनी भरी हुई है कि अपने ही बनाये कायदे कानून तोडने पर उतारू हो जाये.

आगे पढते-पढ़ते आपको महसूस होता हैं कि शोधार्थी के अंदर चौसर और शेक्सपीयर दोनों की रूहें एक साथ प्रवेश कर गयी हैं. और ये रूहें उससे एक अनूठे किस्म के व्याकरण की इबारत लिखवा रही हैं. आइये एक नमूना दिखाएँ... वाक्य के अंदर कॉमा तथा सेंटेसों के बीच फुल स्टॉप तो दुनिया लगाती है. सो आपने लगा कर कौन से तीर मार लिए. मज़ा इस बात में है कि सेंटेंसों के बीच फुलस्टॉप, कॉमा आदि  की दीवार गिराते हुए उन्हें प्रेमी युगलों की तरह एक हो जाने दिया जाये. बांटने का काम तो दुनिया सदा करती आई है और करती रहेगी. इसके उलट, जोड़ने का काम किया जाये तो कुछ बात है! बस यही तुरपाई का काम उन्होंने जगह-जगह किया होता है. वैसे ऐसा लगता नहीं कि जाति तौर पर उन्हें फुल स्टॉप से कोई परहेज़ है. कई दफा सेंटेंस अगर कुछ ज्यादा ही लम्बा हुआ तो वे उसके ख़त्म होने का इन्तजार करते नहीं दीख पड़ते, बल्कि मंजिल से कोई आठ दस कदम पहले ही तम्बू (फुल स्टॉप) लगा कर बैठ जाते हैं.

आगे बढें तो और भी अजीबो गरीब नज़ारे नजर आने लगते हैं. कहीं पूर्ण विराम के बाद भी अक्षरों में इतनी जान नहीं आई होती कि वे तन कर चल सकें, जोड़ों के मरीज़ की तरह घिसटते से नहीं. तो कहीं शब्दों के कई पहले अक्षर कक्षा के उन बच्चों की तरह खड़े दिखाई देते हैं जो एक सिरफिरे शिक्षक के हाथों अकारण बेंचों पर खड़े होने की सजा भुगत रहे हों.  

सब जानते हैं कि भाषण देते वक़्त, वक्ता एक मर्तबा  बांये देखता है तो दूसरी मर्तबा दांये. वाहन भी अक्सर कभी फोर्थ गीयर में चलते हैं, कभी सेकेण्ड या थर्ड में. यहाँ तक कि भैंस भी कभी एक करवट बैठती है तो कभी दूसरी करवट. मगर एक अपने शोधार्थी मियां हैं जो एक बार लिखना शुरू करते हैं तो फिर उसी सुर ताल में, बिना सर ऊपर उठाए, लिखते चले जाते हैं. पैरा वैरा बदलने जैसा कोई फालतू रोग वे कतई नहीं पालते.

हाँ, इनमें एक सिफ़त है... जो भी इन्हें कहा जाता है सो ये झट कर डालते हैं. यह जरूर है कि करने के बाद कभी पलट कर नहीं देखते कि इन्होंने किया क्या है! कागजों का पुलिंदा गाइड के मत्थे मढने को वे उतने ही उतावले रहते हैं, जितना एक जवान लड़की का बाप लड़की के हाथ पीले कर गंगाजी नहाने के लिए होता है. 



ऐसी सूरत में गाइड की गत, गाइड जाने!!   

Monday, May 4, 2015

फोटो शूट



वे बहुत पहुंचे हुए थे. जिस पर उनकी कृपा होती उसकी जिंदगी ही बन जाती. बड़ी सिफारिशों के बाद मिलने का समय मिला. इन्हें लेकर पहुंचे तो डायरेक्टर नुमा अदा से रिवोल्विंग चेयर पर विराजे हुए थे. मिलते ही पूछा- कोई पुरानी फोटो लाये हो? हमने 'नहीं' कहा तो मन ही मन खुश नजर आये. मानो सोच रहे हों- एकदम रॉ है, बिलकुल फ्रेश मॉडल की तरह! दुनिया के सामने ला कर धमाका कर देंगें!

फिर हमें स्टूडियो भेज दिया गया. फोटोग्राफर ने बताया कि पहले बैठी मुद्रा में फोटो खींचेंगे. बोला- आप सामने की ओर पैर फैला कर बैठ जायें. 'ये पैर थोडा पीछे ले लें.' 'साड़ी पिंडलियों से ऊपर कर लें.' 'नहीं, नहीं, पैर अंदर की ओर मोड़ें.' 'हिलें नहीं, सीधे देखे.'....'बस एक मिनट.' 'ठीक!' इस तरह क्लैप शॉट ओके हो गया. ऐसा ही कुछ दूसरे पैर के साथ दोहराया गया. हमने सोचा बुद्धा मुद्रा अब ख़त्म हुई, अब विवेकानंद मुद्रा शुरू होगी. किन्तु हम गलत थे. उन्होंने अब दोनों पैर घुटनों तक मोड़ कर बैठने को कहा जैसे अक्सर लोग गमी में बैठते हैं. उसके बाद तो हद ही कर दी. पूरी जांघों तक स्ट्रिपटीज़ करा दिया. मुए ने पत्नी के बुढ़ापे की लाज तक नहीं रखी! खैर शरमा शरमी में शॉट जल्दी ओके हो गया.

अब वे अपना कैमरा उड़ा कर छत पर ले गए. फिर हुक्मनामा जारी किया- खड़े हो जाएँ. बायाँ पैर थोडा आगे, हाथ कमर पर, निगाहें सधी हुई. बचपन की सहेली की तरह स्टेच्यू बोल कर कैमरे की ओट  में जाकर प्रिव्यु देखने लगे. ओट से बाहर निकल कर सीन की सेटिंग बदली. पैर के नीचे कुशन का जैक लगा कर उसे बालिश्त भर ऊपर उठा दिया. आखिर काफी तकलीफ और थोड़ी जद्दोजहद के बाद यह शॉट भी ओके हो गया. फिर तो कैमरे की पोजीशन को लगातार बदलते हुए अलग-अलग पोज़ में न जाने कितने फोटो निकाल मारे.



खैर फोटो सेशन संपन्न हुआ. खींचे गए फोटो के नेगेटिव बारी-बारी और बारीकी से देखने के बाद डायरेक्टर उर्फ़ हड्डी-डॉक्टर ने भारी आवाज़ में फैसला सुना दिया. 'दोनों घुटने बुरी तरह घिस गए हैं....इन्हें बदलना ही इनका इलाज है.'     

Saturday, April 11, 2015

खोपड़ी रस

पहली कतार में बैठे लोगों के धड़ पूरी तरह सोफों में धंसे थे. जो हिस्सा नज़रों में आने लायक बचा था, वह उनकी खोपड़ियाँ ही थी. खोपड़ियाँ प्रौढ़ थीं, चंचला होती तो इधर उधर घूमती. इधर उधर घूमती तो आसानी से शिनाख्त में आ जाती. सभागार का मंच निपट ख़ाली था, बाँध कर नहीं रख सकता था. सो, खोपड़ी रस के आस्वादन के सिवाय कोई चारा न था.

किनारे वाली खोपड़ी का मुआयना करने पर लगता था कि वह जरूर किसी बड़े नेता की रही होगी. ऐसा मालूम होता था गोया हाल ही में विरोधियों के टोपी-रुपी चीरहरण के शिकार बनाये गए हों. कोस-कोस दूर तक उघडे इलाके पर दो बाल बड़े जतन से धरे हुए दिख रहे थे. ठीक वैसे ही जैसे कोई बेबस यौवांगना वहशी दरिंदों के सामने दोनों हाथों से अपनी इज्ज़त ढांपने की नाकाम कोशिश कर रही हो.

उसके बगल वाली खोपड़ी जो थी वह किसी धुरंधर भूगोल शास्त्री की लगती थी. किनारे-किनारे चलो तो डेल्टा के मैन्ग्रोव के जंगल जैसे दीखते थे  किन्तु बीचो-बीच का नज़ारा यूँ, जैसे लहलहाते रेगिस्तान में इक्का दुक्का झाड़ियाँ उग आयीं हों. आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो महसूस होता था मानों निर्जन स्थान पर कोई साधु अपना चिमटा गाड़ कर कहीं चला गया हो. अगली खोपड़ी किसी दर्शन शास्त्री की सी नज़र आ रही थी. इस कदर सुदर्शन, नरम गुदाज़ जैसे वसंती पात या किसी नवजात शिशु के कोमल गाल! डर था कि ज्यादा  देर देख लिया तो कहीं चूमने का मन ही ना करने लगे.

अब जो खोपड़ी नज़रों के सामने थी उस पर अल्लाह खूब मेहरबान था. बालों की छटा देखते ही बनती थी. मगर उन आला दर्जे के बालों का कालापन जरूरत से कुछ ज्यादा ही गहरा दीख रहा था. मानों कुदरत ने इनके लिए काली स्याही के ड्रम के ड्रम खोल दिए हों. कभी-कभी ऐसा भी शक़ होता था कि कहीं खास आज के जलसे की खातिर ही जम कर रंगाई पुताई ना कराई गयी हो!

कतार में लगी खोपड़ियों में एक खोपड़ी बड़ी हिमाकती भी थी. बाले-बाले अभी सर पर एक रुपये के सिक्के के बराबर भी जगह खाली नहीं हो पाई थी और महाशय निकल पड़े थे पहली कतार में बैठने! आसपास की सभी पकी खोपड़ियाँ  उसकी खिल्ली सी उड़ाती दिख रही थीं. मानों धिक्कारती हुई कह रही हों, "जरा औकात में रह, सींकिया पहलवान! अभी आठ दस साल और दंड पेल, तब जाकर कहीं हमारे बराबर में खड़े होने की सोचना."

कतार में दो एक खोपड़ियाँ ऐसी भी थी जो दृश्यमान नहीं थी, पोशीदा थी. उनके चोले या बाने को देख कर उनकी मौजूदगी का अहसास जरूर होता था. पर इन खोपड़ियों के नीचे जड़े धडों में जवां दिल धड़क रहा था कि बुजुर्ग, इसकी तस्दीक करने का कोई जरिया नहीं था. न इनके जुगराफिये का पता लग सकता था और न ही तारीख के इनके ऊपर छोड़े गए निशानों का. ये बरमूडा ट्रायएंगल की तरह रहस्यमयी थी. सो इनके बारे में मुकम्मल तौर पर कुछ भी कहना मुमकिन नहीं था. हम इनका तिलस्सिम तोड़ने का जुगाड़ कर ही रहे थे कि अचानक रंग में भंग पड़ने से खोपड़ी रस बे मज़ा हो गया.


हुआ यूँ कि उद्घोषिका की घोषणा के साथ ही अतिथि गण मंच पर पधार गए.