- वह जो कान से मोबाइल चिपकाये, दोनों जहानों से बेखबर सड़क पर इस अदा से चला जा रहा था कि रिमझिम बरखा में जुगाली करता भैसों का झुण्ड उससे रश्क करे.
- दूसरों को चुनौती देता सा कोई मतवाला जो सुबह-सुबह घर से चाय की प्याली नहीं बल्कि अमरता का प्याला पी कर निकला हो. गो ख़म ठोक कर कह रहा हो - 'है कोई माई का लाल, जो मेरा कुछ बिगाड़ सके...मैं अभी उसकी टांग के नीचे से निकलने को तैयार हूँ.
- सड़क पर उतर पड़ा एक ऐसा शख्स जिसके वास्ते हर वाहन चालक को चौकस और चौकन्ना रहना पड़ता है. डार्विन की 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' की थ्योरी को गलत साबित करता एक चलता-फिरता उदाहरण! एक नए मुहावरे- 'मरता, तो भी कुछ न करता' को गढ़ता हुआ, जो अपनी सलामती का पूरा जिम्मा सामने वाले पर डाले रहता है.
- भोले नाथ का कोई सिर-चढ़ा भक्त. चिलचिलाती धूप और कडकडाती ठण्ड में एक टांग पर खड़े हो कर किये घनघोर तप की फिरौती के रूप में जिसे भक्तवत्सल ने वरदान दिया हो ... 'बच्चे जा, तुझे न कोई ट्रक कुचल सकेगा, न डम्पर; न कोई कार तुझे टक्कर मार सकेगी न ही सिटी बस. जब तलक तू सड़क का दामन नहीं छोड़ेगा, सर्वथा सुरक्षित रहेगा.
- कुर्बानी के जज्बे से लबरेज़ कोई शासकीय कर्मचारी, जो अपने निखट्टू बेटे के मोह में पड कर अपने जीवन की बलि देने चला हो ताकि बेटे को अनुकम्पा नियुक्ति दिलवा सके.
- दोनों तरफ कतार बांधे खड़े कोर्निश बजाते दरबारियों के बीच से हो कर गद्दी नशीन होने जाते हुए जिल्ले-इलाही, आफ़ताबे-वतन, शहंशाहे हिन्दुस्तान की भटकी हुई आत्मा.
- 'थर्ड पार्टी' जिसके नाम पर इंश्योरेंस कम्पनियाँ अपना खजाना तो भर लेती हैं किन्तु दैवीय चूक से जिसे कुछ हो जाने पर गाँठ ढीली करने के बजाय कानून छांटने लगती हैं
- ......पता नहीं वह कौन था?...जो भी था, मगर रहा लाख होर्न बजाने के बावजूद बेसुध! 'मीर' साहब ने इनके लिए यूँ फरमाया है... तेरे बेखुद जो हैं सो क्या चेतें. ऐसे डूबे कही उछलते हैं.
Sunday, September 19, 2010
वो कौन था...?
Thursday, September 9, 2010
इंडिया गोट टेलेंट
कुदरत का अपना सीधा-सीधा निजाम है. मौसम आने पर फूल खिलते हैं, वक़्त से फल लगते हैं और पक जाने पर टपक जाते हैं. आदमी का निजाम कुछ अलग ही है. विश्वविद्यालयों के इन्तेजाम की एक बानगी देखिये, हालात कमोबेश ऐसे हैं. कैलेण्डर के हिसाब से माने तो अभी हम सत्र २०१०- २०११ के बीच में हैं. मगर विश्वविद्यालयों में सत्र २००६-०७ के विद्यार्थी परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिस पर कालिजों की मान्यता के विवाद के चलते माननीय न्यायालय ने रोक लगा रखी है. सत्र २००७-०८ की प्रायोगिक परीक्षाओं का दौर चल रहा है. २००८-०९ की पढाई परवान पर है तो साथ ही २००९-१० के प्रवेश भी जारी हैं. मुमकिन है कि २०१०-११, यानि मौजूदा सत्र की प्रवेश परीक्षा का विज्ञापन जारी करने के लिए सचिवालय में अफसरों की बैठक हो रही हो. ...मानते हैं न- इंडिया गोट टेलेंट
अंत में...
मम्मी ने अपने बेटे के स्कूली दोस्त प्रियेश के पापा का फोन नंबर प्रियेश डैड के नाम से सेव कर रखा था. एक दिन उनका एक अलग नंबर से फोन आया. मम्मी ने यह नया नंबर भी सेव करने की सोची. नाम की जगह थोडा सोचने के बाद लिखा...प्रियेश डैड २ और सेव का बटन दबा दिया.
Friday, August 13, 2010
परप्रांतीयता पर एक राज्य नेता की पत्रकार वार्ता
पत्रकार- महोदय, आपका बयान आया है कि परप्रांतीय लोगों से राज्य में मलेरिया फैल रहा है. हमें तो प्राइमरी में यही पढाया गया था कि मच्छर ही मलेरिया फैलाते हैं. हमारी तुच्छ बुद्धि में यह बात नही बैठ पा रही कि आखिर प्रांतीयता मच्छरों की जननी कैसे हो सकती है.
राजनेता- वे शिक्षक जिन्होंने आपको यह गलत पाठ पढाया अवश्य ही परप्रांतीय रहे होंगे!
पत्रकार- चलिए मान लेते हैं कि पाठ गलत था. किन्तु गलत पाठ पढने से मच्छर तो नहीं पैदा हो जाते? तब प्रान्त पर भला मलेरिया संकट कैसे आ सकता है?
राजनेता- आप नहीं जानते परप्रांतीय जब भी आते हैं तो अकेले नहीं आते. खटमल भरा बिस्तर, मच्छरों की पौधशाला कीचड और ख़राब रहन सहन भी साथ लाते है.
पत्रकार- लेकिन परप्रान्तियों की झोंपड पट्टियों में पनपने वाले मच्छर तो इन्हीं गन्दी बस्तियों के रहवासियों को काटेंगे ना?
राजनेता- यही तो भेद है. ये मच्छर भी परप्रांतीय होते हैं, इसलिए हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं. सो रातों में चुन-चुन कर स्थानीय लोगों को ही काटते हैं.
पत्रकार- तो मलेरिया की रोकथाम का क्या रास्ता सोचा है आपने?... क्या स्वच्छ और पक्के मकान मुहैय्या कराने अथवा कोई ज्यादा कारगर मच्छर मार दवाई विकसित करने की योजना है? कहीं आप प्रत्येक राज्यवासी के लिए एक यू आई ड़ी बनवाने की तो नहीं सोच रहे?
राजनेता- नहीं, नहीं...ये सब बकवास हैं. एक ही रास्ता है- परप्रान्तियों की घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना. जो पहले से यहाँ रह रहे हैं, उन्हें डंडे के जोर पर खदेड़ बाहर करना.
पत्रकार- माफ़ कीजिये, आप ने फैज़ साहब के वे शे'र तो सुने होंगे...
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद
कब नज़र में आएगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
राजनेता- बब्बर शेर मुजरे नहीं सुना करते अदीब...परदेसियों के तो हरगिज़ नहीं! वे तो बस दहाड़ सुनते है. आपका काम सवाल पूछना है, आप सवाल पूछिए.
पत्रकार- मेरा सवाल है कि परप्रांतीय कोई उठाईगीर हैं क्या? इनकी अगली पीढ़ी भी यहीं इसी प्रान्त में पैदा हो चुकी है. आप बताएँगे कि इन्हें प्रांतीय कहलाने में अभी और कितना अरसा लगेगा?
राजनेता- साँप होता है न, उसका बच्चा तो सपोला ही कहलायेगा? शहर में रहने से क्या अपना स्वभाव छोड़ देगा?...ये लोग परप्रांतीय थे और परप्रांतीय ही रहेंगे.
पत्रकार- चलो, मलेरिया का खात्मा तो हो गया. मगर डायबिटीज़, कैंसर, एच आई वी, हार्ट अटैक आदि का क्या होगा? अपने प्रिय प्रान्त को एक सम्पूर्ण निरोगी प्रान्त बनाने के लिए आप कौन से ठोस कदम उठाने जा रहे है.
राजनेता- हम प्रादेशिक सीमा के चप्पे-चप्पे पर कार्यकर्ता तैनात करेंगे. जो परप्रांतीय मानसूनी हवाओं को प्रदेश में तभी प्रवेश देंगे जब वे परप्रांतीयता नामक विषाणु से रहित होने का प्रमाण प्रस्तुत करेंगी. साथ ही वे यह भी देखेंगे कि बैरी बदराओं की आड़ में राज्य की जनता की सेहत से खिलवाड़ करने के लिए कहीं पडौसी सूबों से नर्सों की कबूतरबाजी तो नहीं की जा रही?
पत्रकार- ठीक है, मगर इस योजना में मानवीय चूकों की सदा गुंजायश रहेगी. इस के मद्दे-नजर आपके पास क्या विकल्प हैं?
राजनेता- सही कहा आपने. परप्रांतीयता की समस्या से सदा-सदा के लिए निजात पाने के लिए हमें अपने प्रिय प्रान्त को देर सबेर किसी टापू पर शिफ्ट करना होगा...राज्य की जनता को चाहिए कि वह इस कठोर निर्णय के लिए तैयार रहे.
राजनेता- वे शिक्षक जिन्होंने आपको यह गलत पाठ पढाया अवश्य ही परप्रांतीय रहे होंगे!
पत्रकार- चलिए मान लेते हैं कि पाठ गलत था. किन्तु गलत पाठ पढने से मच्छर तो नहीं पैदा हो जाते? तब प्रान्त पर भला मलेरिया संकट कैसे आ सकता है?
राजनेता- आप नहीं जानते परप्रांतीय जब भी आते हैं तो अकेले नहीं आते. खटमल भरा बिस्तर, मच्छरों की पौधशाला कीचड और ख़राब रहन सहन भी साथ लाते है.
पत्रकार- लेकिन परप्रान्तियों की झोंपड पट्टियों में पनपने वाले मच्छर तो इन्हीं गन्दी बस्तियों के रहवासियों को काटेंगे ना?
राजनेता- यही तो भेद है. ये मच्छर भी परप्रांतीय होते हैं, इसलिए हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं. सो रातों में चुन-चुन कर स्थानीय लोगों को ही काटते हैं.
पत्रकार- तो मलेरिया की रोकथाम का क्या रास्ता सोचा है आपने?... क्या स्वच्छ और पक्के मकान मुहैय्या कराने अथवा कोई ज्यादा कारगर मच्छर मार दवाई विकसित करने की योजना है? कहीं आप प्रत्येक राज्यवासी के लिए एक यू आई ड़ी बनवाने की तो नहीं सोच रहे?
राजनेता- नहीं, नहीं...ये सब बकवास हैं. एक ही रास्ता है- परप्रान्तियों की घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना. जो पहले से यहाँ रह रहे हैं, उन्हें डंडे के जोर पर खदेड़ बाहर करना.
पत्रकार- माफ़ कीजिये, आप ने फैज़ साहब के वे शे'र तो सुने होंगे...
हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद
कब नज़र में आएगी बेदाग़ सब्जे की बहार
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
राजनेता- बब्बर शेर मुजरे नहीं सुना करते अदीब...परदेसियों के तो हरगिज़ नहीं! वे तो बस दहाड़ सुनते है. आपका काम सवाल पूछना है, आप सवाल पूछिए.
पत्रकार- मेरा सवाल है कि परप्रांतीय कोई उठाईगीर हैं क्या? इनकी अगली पीढ़ी भी यहीं इसी प्रान्त में पैदा हो चुकी है. आप बताएँगे कि इन्हें प्रांतीय कहलाने में अभी और कितना अरसा लगेगा?
राजनेता- साँप होता है न, उसका बच्चा तो सपोला ही कहलायेगा? शहर में रहने से क्या अपना स्वभाव छोड़ देगा?...ये लोग परप्रांतीय थे और परप्रांतीय ही रहेंगे.
पत्रकार- चलो, मलेरिया का खात्मा तो हो गया. मगर डायबिटीज़, कैंसर, एच आई वी, हार्ट अटैक आदि का क्या होगा? अपने प्रिय प्रान्त को एक सम्पूर्ण निरोगी प्रान्त बनाने के लिए आप कौन से ठोस कदम उठाने जा रहे है.
राजनेता- हम प्रादेशिक सीमा के चप्पे-चप्पे पर कार्यकर्ता तैनात करेंगे. जो परप्रांतीय मानसूनी हवाओं को प्रदेश में तभी प्रवेश देंगे जब वे परप्रांतीयता नामक विषाणु से रहित होने का प्रमाण प्रस्तुत करेंगी. साथ ही वे यह भी देखेंगे कि बैरी बदराओं की आड़ में राज्य की जनता की सेहत से खिलवाड़ करने के लिए कहीं पडौसी सूबों से नर्सों की कबूतरबाजी तो नहीं की जा रही?
पत्रकार- ठीक है, मगर इस योजना में मानवीय चूकों की सदा गुंजायश रहेगी. इस के मद्दे-नजर आपके पास क्या विकल्प हैं?
राजनेता- सही कहा आपने. परप्रांतीयता की समस्या से सदा-सदा के लिए निजात पाने के लिए हमें अपने प्रिय प्रान्त को देर सबेर किसी टापू पर शिफ्ट करना होगा...राज्य की जनता को चाहिए कि वह इस कठोर निर्णय के लिए तैयार रहे.
Sunday, August 8, 2010
दुआ
मैं हमेशा से तंगदिल और कमतर इंसान नहीं था, हालातों ने मुझे ऐसा बना दिया है. किसी समय मेरे झोंपड़े में भी दस-दस, पंद्रह- पंद्रह मेहमान हफ़्तों-हफ़्तों रहे, मगर मजाल है जो अपने चेहरे पर जरा भी शिकन आई हो. आज यह आलम यह है कि दो जनों के आ जाने से ही प्राण सूखने लगते हैं. सुबह- सुबह जब फ्लश में बाल्टी भर पानी डाला जाता है तो अपना कलेजा मुंह को आने लगता है. गुसल में अतिथियों द्वारा डाला गया एक-एक मग पानी हमें अपनी नंगी पीठ पर दस-दस कोड़ों की तरह बरसता लगता है.... खुदाया या तो नल दे वरना ये दिन किसी को न दिखाए.
फिर जच्चागिरी
आठ दस साल हुए फ्लेट और कार की किश्तों से फ़ारिग हुए. फिर सब तरफ से बराबर दबाव डाला जा रहा है कि गाडी बदल लो , बँगला बुक करा लो. मतलब फिर से बैंकों के चक्कर, लोन की किश्तें चुकाने का सिलसिला. ठीक वैसा ही जैसे बच्चे बियाहे ठाए हो जाने पर किसी औरत को फिर से जच्चागिरी का शौक चर्राने लगे.
सच्चा भारतीय
खबर है कि अमरीका और यूरोप में आइसक्रीम सबसे जियादा खाई जाती है. खुद बराक ओबामा आइसक्रीम के दीवाने हैं. छटे चौमासे शादियों- जन्मदिनों की दावतों में मैं आइसक्रीम खा जुरूर लेता हूँ, मगर प्रेम से तो मैं गन्ना ही चूसता हूँ. इसी तरह पिज्जा बर्गर के बदले भड़भूजे से भुनवाये चने ही चबाना पसंद करता हूँ. तभी तो सच्चा भारतीय होने पर मैं गर्व से भर उठा हूँ!
Saturday, July 24, 2010
दूर संचार क्रांति
दूर संचार क्रांति: एक
उनकी बीसवीं वेडिंग एनिवरसिरी थी। सेलिब्रेशन के लिए शहर के एक टॉप होटल में केंडल डिनर की एक टेबल बुक करा ली गई। कपल बन संवर कर होटल पहुंचा। आर्डर देने के बाद पति-पत्नी अपने-अपने मोबाइलों पर सगे सम्बन्धियों और हितैषियों से बधाइयाँ स्वीकारने लगे। होटल की तफसील, लिए-दिए गए गिफ्टों का ब्यौरा और डिनर के मेन्यु की सिलसिलेवार जानकारी देते-देते पता ही नहीं चला कि केंडल मुई कब गुल हो गई, डिनर कब ख़त्म हुआ।
इब्ने इंशा का एक शे'र है:
हमसे नहीं मिलता भी, हमसे नहीं रिश्ता भी
है पास वो बैठा भी, धोका हो तो ऐसा हो
दूर संचार क्रांति: दो
अतिथियों को लेने स्टेशन जाना था। गाड़ी पहुँचने के निर्धारित समय, ग्यारह बज कर चालीस मिनट से कोई घंटा भर पहले 'नेट' से गाड़ी की स्थिति जाननी चाही। इतना ही सुराग लग पाया कि सुबह छः बजे भवानी मंडी छोड़ चुकी है। लाचार हो कर हमने फोन का सहारा लिया। तब जो घटित हुआ उसकी बिना संपादन , अविरल प्रस्तुति निम्न है:
नमस्कार... भारतीय रेल की पूछताछ सेवा में आपका स्वागत है... हिंदी में जानकारी के लिए १ दबाएँ... गाडी की स्थिति जानने के लिए गाड़ी का नंबर दबाएँ... आपके द्वारा दबाया गया नंबर है-क...ख...ग...घ। यह नंबर गलत है। (जबकि नंबर एकदम सही था) ... धन्यवाद। फिर वही चक्र- नमस्कार...धन्यवाद।
पूछताछ नंबर १३१ पर संपर्क करने की जहमत उठाने का न अपना कोई इरादा था न ही इतना वक़्त। सो तुरंत स्टेशन कूच करने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहा। जब एक बजे तक भी गाड़ी प्लेटफार्म की तरफ आती नहीं दिखी, हम फिर पूछताछ खिड़की की ओर भागे। वहाँ सूचना पट्टपर लिखा था- पंद्रह मिनट देरी से। आखिर मेहमानों को लेकर घर पहुंचे तो थाने में गुमशुदगी की रपट लिखाने की मंशा से पत्नी ताला बंद करती मिली।
दूर संचार क्रांति: तीन
आपको कालिजों के इंस्पेक्शन पर जाना है। अर्जी दाखिल करते समय अक्सर कालिज कैम्पस में चल रहे अन्य कोर्सेस की जानकारी छुपा लेते हैं। इस कृत्य से आवेदित कोर्स के लिए आधारभूत सुविधाओं (बिल्डिंग, फर्नीचर, पुस्तकें आदि) को बढ़ा चढ़ा कर दिखा दिया जाता है। जैसे ही आपको पता चलता है कि कालिज की वेब साईट भी है, आप ख़ुशी से झूम उठते हैं । सोचते हैं- धन्य हो सूचना तकनीकी का युग- सब पर्दाफाश कर देगा! आप बैलगाड़ी और मजदूरों की टोली लेकर सूचना की लहलहाती फसल काटने सम्बंधित खेत पर पहुँचते है। सामने मिलता है एक तख्ती लगा सपाट खेत, जिस पर अमूमन लिखा होता है- खेत की जुताई जारी! असुविधा के लिए खेद। मेंड़ों पर उग आई खरपतवार हाथ आ जाए तो आपकी खुशकिस्मती, वरना तय मानिए कि सूचना के विस्फोट में उड़ गए आपके परखच्चे!!
उनकी बीसवीं वेडिंग एनिवरसिरी थी। सेलिब्रेशन के लिए शहर के एक टॉप होटल में केंडल डिनर की एक टेबल बुक करा ली गई। कपल बन संवर कर होटल पहुंचा। आर्डर देने के बाद पति-पत्नी अपने-अपने मोबाइलों पर सगे सम्बन्धियों और हितैषियों से बधाइयाँ स्वीकारने लगे। होटल की तफसील, लिए-दिए गए गिफ्टों का ब्यौरा और डिनर के मेन्यु की सिलसिलेवार जानकारी देते-देते पता ही नहीं चला कि केंडल मुई कब गुल हो गई, डिनर कब ख़त्म हुआ।
इब्ने इंशा का एक शे'र है:
हमसे नहीं मिलता भी, हमसे नहीं रिश्ता भी
है पास वो बैठा भी, धोका हो तो ऐसा हो
दूर संचार क्रांति: दो
अतिथियों को लेने स्टेशन जाना था। गाड़ी पहुँचने के निर्धारित समय, ग्यारह बज कर चालीस मिनट से कोई घंटा भर पहले 'नेट' से गाड़ी की स्थिति जाननी चाही। इतना ही सुराग लग पाया कि सुबह छः बजे भवानी मंडी छोड़ चुकी है। लाचार हो कर हमने फोन का सहारा लिया। तब जो घटित हुआ उसकी बिना संपादन , अविरल प्रस्तुति निम्न है:
नमस्कार... भारतीय रेल की पूछताछ सेवा में आपका स्वागत है... हिंदी में जानकारी के लिए १ दबाएँ... गाडी की स्थिति जानने के लिए गाड़ी का नंबर दबाएँ... आपके द्वारा दबाया गया नंबर है-क...ख...ग...घ। यह नंबर गलत है। (जबकि नंबर एकदम सही था) ... धन्यवाद। फिर वही चक्र- नमस्कार...धन्यवाद।
पूछताछ नंबर १३१ पर संपर्क करने की जहमत उठाने का न अपना कोई इरादा था न ही इतना वक़्त। सो तुरंत स्टेशन कूच करने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहा। जब एक बजे तक भी गाड़ी प्लेटफार्म की तरफ आती नहीं दिखी, हम फिर पूछताछ खिड़की की ओर भागे। वहाँ सूचना पट्टपर लिखा था- पंद्रह मिनट देरी से। आखिर मेहमानों को लेकर घर पहुंचे तो थाने में गुमशुदगी की रपट लिखाने की मंशा से पत्नी ताला बंद करती मिली।
दूर संचार क्रांति: तीन
आपको कालिजों के इंस्पेक्शन पर जाना है। अर्जी दाखिल करते समय अक्सर कालिज कैम्पस में चल रहे अन्य कोर्सेस की जानकारी छुपा लेते हैं। इस कृत्य से आवेदित कोर्स के लिए आधारभूत सुविधाओं (बिल्डिंग, फर्नीचर, पुस्तकें आदि) को बढ़ा चढ़ा कर दिखा दिया जाता है। जैसे ही आपको पता चलता है कि कालिज की वेब साईट भी है, आप ख़ुशी से झूम उठते हैं । सोचते हैं- धन्य हो सूचना तकनीकी का युग- सब पर्दाफाश कर देगा! आप बैलगाड़ी और मजदूरों की टोली लेकर सूचना की लहलहाती फसल काटने सम्बंधित खेत पर पहुँचते है। सामने मिलता है एक तख्ती लगा सपाट खेत, जिस पर अमूमन लिखा होता है- खेत की जुताई जारी! असुविधा के लिए खेद। मेंड़ों पर उग आई खरपतवार हाथ आ जाए तो आपकी खुशकिस्मती, वरना तय मानिए कि सूचना के विस्फोट में उड़ गए आपके परखच्चे!!
Thursday, July 15, 2010
पहाड़ों की सैर कर लो
चलो आज पहाड़ों पर 'घूमें'।यहाँ के सफ़र की तो बस पूछो ही मत! सड़कें इस कदर संकरी कि आमने सामने के वाहनों के ड्राईवर चाहें तो एक दूसरे को धौल जमाते निकलें, लाल-बत्ती रहित मोड़ इतने अंधे कि रोड रोलर भी जब तक नाक पर न चढ़ आये तब तक न दिखे, और रास्ते इस हद लहरदार कि आपको उत्तर दिशा में जाना हो तो सारा समय या तो आप पूरब को जा रहे होते हैं या पश्चिम को। चाल को आधार बना कर यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि साँप चाहे मैदानों, रेगिस्तानों में भी मिलते हों परन्तु उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा जरूर पहाड़ों में हुई होगी। चक्कर के घनचक्कर की एक बानगी देखिये। हमने एक राहगीर से पूछा- भाई साहब, ये बिन्सर महादेव कहाँ पड़ेगा? बोला- बस चलते चलो, जब एक सौ उनतालिसवें घूम पर पहुँचो तो समझो वहीँ बिन्सर महादेव है!
ढलान, चढ़ाव और घुमाव के पहाड़ी जगत की ज्यामिति ही अलग है। मालूम नहीं, यहाँ के स्कूलों में गणित के शिक्षक सरल रेखा और लम्ब के उदाहरण कहाँ से लाते होंगे? वर्ग, आयत आदि को पढ़ाने का जुगाड़ कैसे करते होंगे? दो स्थानों के बीच की दूरी कैसे निकलती होगी? बाकी की तो क्या कहें, यहाँ के तो देवता भी 'गोलू' देवता हैं। सड़कों पर चक्कर खाती गाड़ियों को इन्हीं गोलू देवता का वरदान प्राप्त है कि जब तक वे पहाड़ की साइड रहेंगी तो नहीं पलटेंगी, मगर अभिशाप भी कि घाटी की तरफ पलटी तो बचेंगी नहीं। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सड़कों में हलके झोल डाले गए थे ताकि पंचर होने की सूरत में ड्राईवर को पहिया बदलने की जगह मिल सके।
पहाड़ों के सफ़र की एक और खासियत है। इस दौरान आपकी इकलौती आँख कार्यशील रहती है, दूसरी चौपट हो जाती है...बारी-बारी। पहाड़ कभी आपकी बांयी आँख पर मोटा पट्टा बांध देता है तो कभी दांयी आँख पर, ठीक हिंदी फिल्मों के बदमाश की तरह। कुल मिला कर पांच दिनों के सफ़र में ढाई दिन आपके वाम चक्षु चलेंगे तो ढाई दिन दक्षिण। हर मोड़ पर कुदरत की किताब के नए-नए वरक खुलते चलते है। हो सकता है राह में किसी बियाबान जगह आपको एक स्कूल का साइन बोर्ड मिल जाए, मगर चारों तरफ निगाह दौड़ाने पर कोई भी इमारत न दिखे। ऐसे में आप खुद को एक अजीब गुत्थी में उलझा पाएंगे- यही कि पिक अप वैन की इंतजार कर रहे बच्चे रसोई में चीनी पर जमा चींटियों की तरह आखिर किन ठिकानों से आये हैं?
चौराहों पर राहें फटती नहीं वरन उठती या गिरती हैं। अब यह आप जानों कि आपको ऊपर वाली सड़क पकडनी है या नीचे वाली...ऊपर की तो कितने ऊपर की और नीचे की तो कितने नीचे की? हाँ, एक बात और...मकानों के बराबर में रखी टंकियों को देख कर यह भरम मत पालिए कि ये इन्हीं मकान मालिकों की है। दरअसल ये निचले तल्ले के लोगों के ओवरहेड टैंक हैं। धान के खेत ऐसे नज़र आते हैं गो किसी विशाल किन्तु उजाड़ स्टेडियम की सीढ़ीनुमा दीर्घाओं में मिटटी डाल कर रौपाई कर दी गयी हो।
रही बात यहाँ के बाशिंदों की- यहाँ के इंसान, पालतू पशु और मकान सब पहाड़ों की छाया में ठिगने दिखाई देते हैं। पहाड़ी कुत्ते की ही मिसल लें। गठा बदन, मैदानों के मुक़ाबिल झबरीला मगर कद काठी में उन्नीस, जैसे गढ़ने वाले ने ऊपर तथा साइडों से दबा दिया हो।...वो कहते हैं न कि 'अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे'।
ढलान, चढ़ाव और घुमाव के पहाड़ी जगत की ज्यामिति ही अलग है। मालूम नहीं, यहाँ के स्कूलों में गणित के शिक्षक सरल रेखा और लम्ब के उदाहरण कहाँ से लाते होंगे? वर्ग, आयत आदि को पढ़ाने का जुगाड़ कैसे करते होंगे? दो स्थानों के बीच की दूरी कैसे निकलती होगी? बाकी की तो क्या कहें, यहाँ के तो देवता भी 'गोलू' देवता हैं। सड़कों पर चक्कर खाती गाड़ियों को इन्हीं गोलू देवता का वरदान प्राप्त है कि जब तक वे पहाड़ की साइड रहेंगी तो नहीं पलटेंगी, मगर अभिशाप भी कि घाटी की तरफ पलटी तो बचेंगी नहीं। थोड़ी-थोड़ी दूर पर सड़कों में हलके झोल डाले गए थे ताकि पंचर होने की सूरत में ड्राईवर को पहिया बदलने की जगह मिल सके।
पहाड़ों के सफ़र की एक और खासियत है। इस दौरान आपकी इकलौती आँख कार्यशील रहती है, दूसरी चौपट हो जाती है...बारी-बारी। पहाड़ कभी आपकी बांयी आँख पर मोटा पट्टा बांध देता है तो कभी दांयी आँख पर, ठीक हिंदी फिल्मों के बदमाश की तरह। कुल मिला कर पांच दिनों के सफ़र में ढाई दिन आपके वाम चक्षु चलेंगे तो ढाई दिन दक्षिण। हर मोड़ पर कुदरत की किताब के नए-नए वरक खुलते चलते है। हो सकता है राह में किसी बियाबान जगह आपको एक स्कूल का साइन बोर्ड मिल जाए, मगर चारों तरफ निगाह दौड़ाने पर कोई भी इमारत न दिखे। ऐसे में आप खुद को एक अजीब गुत्थी में उलझा पाएंगे- यही कि पिक अप वैन की इंतजार कर रहे बच्चे रसोई में चीनी पर जमा चींटियों की तरह आखिर किन ठिकानों से आये हैं?
चौराहों पर राहें फटती नहीं वरन उठती या गिरती हैं। अब यह आप जानों कि आपको ऊपर वाली सड़क पकडनी है या नीचे वाली...ऊपर की तो कितने ऊपर की और नीचे की तो कितने नीचे की? हाँ, एक बात और...मकानों के बराबर में रखी टंकियों को देख कर यह भरम मत पालिए कि ये इन्हीं मकान मालिकों की है। दरअसल ये निचले तल्ले के लोगों के ओवरहेड टैंक हैं। धान के खेत ऐसे नज़र आते हैं गो किसी विशाल किन्तु उजाड़ स्टेडियम की सीढ़ीनुमा दीर्घाओं में मिटटी डाल कर रौपाई कर दी गयी हो।
रही बात यहाँ के बाशिंदों की- यहाँ के इंसान, पालतू पशु और मकान सब पहाड़ों की छाया में ठिगने दिखाई देते हैं। पहाड़ी कुत्ते की ही मिसल लें। गठा बदन, मैदानों के मुक़ाबिल झबरीला मगर कद काठी में उन्नीस, जैसे गढ़ने वाले ने ऊपर तथा साइडों से दबा दिया हो।...वो कहते हैं न कि 'अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे'।
Sunday, July 11, 2010
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