Sunday, April 24, 2011

साला मैं तो साहब बन गया!

लो, घर बैठे ही हम भी साहब बन गए. बिन दफ्तर, घंटी के साहब बन गए. पी.ए. प्यून के बगैर ही साहब बन गए. एक जमाना था जब हम मामूली चीज हुआ करते थे. बड़े लोगों को शान से फीकी चाय की मांग करते देख, 'चाय में कितनी शक्कर?' के जवाब में 'दो चम्मच' कहते हुए हम शर्म के मारे गड़ जाया करते थे. 
मगर आज की बात कुछ और है. आज दुनिया बदल गयी है. आज हम भी उनके बराबर आ गए हैं. अपनी गौरवशाली उपलब्धि की उदघोषणा जब हमने इस एलीट क्लब में की, तो सदस्यों के चेहरे पर जो भाव दिखे वे ऐसे थे मानो कोई ठेठ गांवड़ा पोटली बगल में दबाये एसी कोच में चढ़ा आ रहा हो या फिर कोई चपरासी अफसर की कुर्सी पर बैठने की हिमाकत कर बैठा हो. खैर! फ्रेशर समझते हुए उन्होंने हम पर सवाल दागने शुरू कर दिए. हमारे ब्लड शुगर के आंकड़े सुन कर उन्होंने हमें ऐसे देखा गोया कोई गली-नुक्कड़ का किरकेटर सचिन तेंदुलकर बनने के ख्वाब देखने की ध्रष्टता  कर रहा हो... फिर धिक्कारते हुए कहा- बस इतनी ही! इससे ज्यादा तो हमारी 'फास्टिंग' ही थी भोजन के बाद की तो साढ़े तीन सौ पार थी...डॉक्टर का तो यहाँ तक कहना था कि आप चल फिर कैसे रहे हो! इतने में तो आपको गिर पड़ना चाहिए था. अब वे कुर्सी से उठते हुए बोले- जाओ मियां, अभी कुछ साल और रबड़ी सूंतो, रसमलाई उडाओ... तब जा कर हमारी बराबरी का दम भरना. 
हमने जहान भर की दीनता दिखाते हुए निवेदन किया- अरे, कहाँ मैं और कहाँ आप! आप तो पहुंचे हुए हैं...मैं तो अभी बच्चा हूँ आपके सामने. अपने अनुभवों का लाभ इस अकिंचन को दें तो महती कृपा होगी. वे तनिक पिघले और किसी रंगरूट को हिदायत देते हुए ट्रेनर से बोले- देखो, तुम्हे डरने की बिलकुल जरूरत नहीं है. बस मीठा छोड़ दो, और नपती की खुराक लो....बाजार से एक रूलर और स्पोर्ट्स शूज़ ले आओ और रोज छः छः किलोमीटर की सैर पेलो. 'रूलर क्या डाईबिटीज़ वालों के लिए जरूरी है?' 'नहीं, यह कुत्तों के लिए जरूरी है... वक्त-बेवक्त घूमने निकलोगे तो कुत्तों के हलकों से जरूर गुजरोगे और वे इसे पसंद नहीं करेंगे....और हाँ एक बात और...सैर के समय हरचंद टी-शर्ट और हाफ-पेंट ही पहनना' 'वो भला क्यूँ?, हमने पूछा. ' साहेबाना लुक मुक्कमल करने के लिए.' ' सर, बुरा न माने तो मेरी एक छोटी सी जिज्ञासा थी...क्या मैं एक झबरा डोगी पाल लूँ?' 'इंसुलीन के इंजेक्शन ठुकवाने हों तो बेशक पाल लो.' 'मैं कुछ समझा नहीं...' 'नित्य कर्मों के सम्पादन हेतु कदम कदम पर वह बाजे वाले की घोड़ी की माफिक ठहरेगा तो तुम एक दो किलोमीटर से ज्यादा क्या ही घूम पाओगे....फिर इंसुलीन के इंजेक्शन ठुकेंगे कि नहीं?' आखिर कडवे नीम के चूर्ण की फंकी के साथ ही अपना बपतिस्मा संस्कार संपन्न हुआ. 

Thursday, April 14, 2011

दुस्साहस



शहर में चोरों का दुस्साहस तो देखिये! गयी रात तीन-तीन घरों की छत पर चढ़ कर चोर परिवारों की सारी जमा पूंजी पर हाथ साफ कर गए। घर के लोगों ने सुबह उठ कर जब छत पर रखी रीती टंकी, बाल्टियाँ, और टब इधर उधर लुढ़के देखे तो उनके कलेजे धक से रह गए! वे तुरंत थाने की ओर भागे। खबर है कि मामले की नज़ाकत को देखते हुए पुलिस ने विशेष दस्तों का गठन कर जल चोरों को पकड़ने की ज़िम्मेदारी सौंपी है।

जल लीला


(पानी वाले से) क्या बात है भैया, हमारे यहाँ बिलकुल भी पानी नहीं आ रहा?
में तो पूरा देता हूँ सर, लोग टंकियाँ भर जाने पर भी मोटर बंद नहीं करते... जंगली घास को नहलाते रहते हैं, पाइप से गाडियाँ धोते रहते हैं।
ठीक कह रहे हो, मगर कुछ तो करो भैया जो हमारे यहाँ भी पानी आए।
(पसीज़ कर) अच्छा, कल आपके यहाँ पानी आएगा। (ध्यान से सुनिए)... कल मैं समय से दस मिनट पहले घड़ी भर को को वाल्व बंद कर दूँगा। पानी गया देख पुरुष निश्चिंत हो कर काम-धंधो पर निकल जाएंगे। ग्रहणियाँ भी घर के काम काज मे भिड़ जाएंगी। तभी में लाइन चालू कर दूंगा ...आप बर्तनों समेत तैयार रहना और मौका मिलते ही घर का पूरा पानी भर डालना!

Tuesday, October 12, 2010

शरीफ बदमाश

जगतनारायण का शहर में औसत कारोबार था. सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था कि एक दिन उन पर गाज गिरी. उनके बेटे मासूम को स्कूल के रास्ते से अगुवा कर लिया गया. देर रात गए फोन पर बदमाशों ने बीस लाख की फिरौती मांगी. जगतनारायण रकम सुन कर धक् से रह गए...गिडगिडा कर बोले, रकम बहुत ज्यादा है. मेरी इतनी हैसियत नहीं, मैं बिक जाऊँगा तो भी इतनी बड़ी रकम नहीं चुका पाऊंगा सरकार! उधर से कड़क आवाज़ आई- मूर्ख मत समझो हमें, जगतनारायण....हम धंधे में नए-नए नहीं हैं, सालों का तजरबा है हमें!...बहुत सोच समझ कर ही रकम बाँधी है हमने तुम्हारे लिए .बच्चे की जान चाहते हो तो सीधे से रकम चुका दो वरना....!!मैं सड़क पर आ जाऊंगा हुजूर, रकम थोड़ी कम कर देते....कुछ तो रहम कीजिए.... पैसों में एक धेला भी कम नहीं होगा. चलो इतनी मोहलत दिए देते हैं  ....तुम एक मुश्त के बजाय तीन, चार, या छः आसान  किश्तों में फिरौती चुका दो!!!

Sunday, September 19, 2010

वो कौन था...?






  • वह जो कान से मोबाइल चिपकाये, दोनों जहानों से बेखबर सड़क पर इस अदा से चला जा रहा था कि रिमझिम बरखा में जुगाली करता भैसों का झुण्ड उससे रश्क करे. 
  • दूसरों को चुनौती देता सा कोई मतवाला जो सुबह-सुबह घर से चाय की प्याली नहीं बल्कि अमरता का प्याला पी कर निकला हो. गो ख़म ठोक कर कह रहा हो - 'है कोई माई का लाल, जो मेरा कुछ बिगाड़ सके...मैं अभी उसकी टांग के नीचे से निकलने को तैयार हूँ.
  • सड़क  पर उतर पड़ा एक ऐसा शख्स जिसके वास्ते हर वाहन चालक को चौकस और चौकन्ना रहना पड़ता है. डार्विन की 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' की थ्योरी को गलत साबित करता एक चलता-फिरता उदाहरण! एक नए मुहावरे- 'मरता, तो भी कुछ न करता' को गढ़ता हुआ, जो अपनी सलामती का पूरा जिम्मा सामने वाले पर डाले रहता है.
  • भोले  नाथ का कोई सिर-चढ़ा  भक्त. चिलचिलाती धूप और कडकडाती ठण्ड में एक टांग पर खड़े हो कर किये घनघोर तप की फिरौती के रूप में जिसे भक्तवत्सल ने वरदान दिया हो ... 'बच्चे जा, तुझे न कोई ट्रक कुचल सकेगा, न डम्पर; न कोई कार तुझे टक्कर मार सकेगी न ही सिटी बस. जब तलक तू सड़क का दामन नहीं छोड़ेगा, सर्वथा सुरक्षित रहेगा. 
  • कुर्बानी  के जज्बे से लबरेज़ कोई शासकीय कर्मचारी, जो अपने निखट्टू बेटे के मोह में पड कर अपने जीवन की बलि देने चला हो ताकि बेटे को अनुकम्पा नियुक्ति दिलवा सके.
  • दोनों तरफ कतार बांधे खड़े कोर्निश बजाते दरबारियों के बीच से हो कर गद्दी नशीन होने जाते हुए जिल्ले-इलाही, आफ़ताबे-वतन, शहंशाहे हिन्दुस्तान की भटकी हुई आत्मा.
  • 'थर्ड पार्टी' जिसके नाम पर इंश्योरेंस  कम्पनियाँ अपना खजाना तो भर लेती हैं  किन्तु दैवीय चूक से जिसे कुछ हो जाने पर गाँठ ढीली करने के बजाय कानून छांटने लगती हैं
  • ......पता नहीं वह कौन था?...जो भी था, मगर रहा लाख होर्न बजाने के बावजूद बेसुध! 'मीर' साहब ने इनके लिए यूँ फरमाया है... तेरे बेखुद जो हैं सो क्या चेतें. ऐसे डूबे कही उछलते हैं. 

Thursday, September 9, 2010

इंडिया गोट टेलेंट

कुदरत का अपना सीधा-सीधा निजाम है. मौसम आने पर फूल खिलते हैं, वक़्त से फल लगते हैं और पक जाने पर टपक जाते हैं. आदमी का निजाम कुछ अलग ही है. विश्वविद्यालयों के इन्तेजाम की एक बानगी देखिये, हालात कमोबेश ऐसे हैं. कैलेण्डर  के हिसाब से माने तो अभी हम सत्र २०१०- २०११ के बीच में हैं. मगर विश्वविद्यालयों में सत्र २००६-०७ के विद्यार्थी परीक्षा परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं जिस पर कालिजों की मान्यता के विवाद के चलते माननीय न्यायालय ने रोक लगा रखी है. सत्र २००७-०८ की प्रायोगिक परीक्षाओं का दौर चल रहा है. २००८-०९ की पढाई परवान पर है तो साथ ही २००९-१० के प्रवेश भी जारी हैं. मुमकिन है कि २०१०-११, यानि मौजूदा सत्र की प्रवेश परीक्षा  का विज्ञापन जारी करने के लिए सचिवालय में अफसरों की बैठक हो रही हो. ...मानते हैं न- इंडिया गोट टेलेंट 
अंत में...
मम्मी ने अपने बेटे के स्कूली दोस्त प्रियेश के पापा का फोन नंबर प्रियेश डैड के नाम से सेव कर रखा था. एक दिन उनका एक अलग नंबर से फोन आया. मम्मी ने यह नया नंबर भी सेव करने की सोची. नाम की जगह थोडा सोचने के बाद लिखा...प्रियेश डैड २ और सेव का बटन दबा दिया. 


Friday, August 13, 2010

परप्रांतीयता पर एक राज्य नेता की पत्रकार वार्ता

पत्रकार- महोदय, आपका बयान आया है कि परप्रांतीय लोगों से राज्य में मलेरिया फैल रहा है. हमें तो प्राइमरी में यही पढाया गया था कि मच्छर ही मलेरिया फैलाते हैं. हमारी तुच्छ बुद्धि में यह बात नही बैठ पा रही कि आखिर प्रांतीयता मच्छरों की जननी कैसे हो सकती है. 
राजनेता- वे शिक्षक जिन्होंने आपको यह गलत पाठ पढाया अवश्य ही परप्रांतीय रहे होंगे! 
पत्रकार- चलिए मान लेते हैं कि पाठ गलत था. किन्तु गलत पाठ पढने से मच्छर तो नहीं पैदा हो जाते? तब प्रान्त पर भला मलेरिया संकट कैसे आ सकता है? 
राजनेता- आप नहीं जानते परप्रांतीय जब भी आते हैं तो अकेले नहीं आते. खटमल भरा बिस्तर, मच्छरों की पौधशाला कीचड और ख़राब रहन सहन भी साथ लाते है. 
पत्रकार- लेकिन परप्रान्तियों की झोंपड पट्टियों में पनपने वाले मच्छर तो इन्हीं गन्दी बस्तियों के रहवासियों को काटेंगे ना?
राजनेता- यही तो भेद है. ये मच्छर भी परप्रांतीय होते हैं, इसलिए हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं. सो रातों में चुन-चुन कर स्थानीय लोगों को ही काटते हैं.
पत्रकार- तो मलेरिया की रोकथाम का क्या रास्ता सोचा है आपने?... क्या स्वच्छ और पक्के मकान मुहैय्या कराने अथवा कोई ज्यादा कारगर मच्छर मार दवाई विकसित करने की योजना है? कहीं आप प्रत्येक राज्यवासी के लिए एक यू आई ड़ी बनवाने की तो नहीं सोच रहे?
राजनेता- नहीं, नहीं...ये सब बकवास हैं. एक ही रास्ता है- परप्रान्तियों की घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना. जो पहले से यहाँ रह रहे हैं, उन्हें डंडे के जोर पर खदेड़ बाहर करना. 
पत्रकार- माफ़ कीजिये, आप ने फैज़ साहब के वे शे'र तो सुने होंगे...
        हम कि ठहरे अजनबी इतनी मुलाकातों के बाद 
        फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाकातों के बाद 
        कब नज़र में  आएगी  बेदाग़  सब्जे की  बहार
        खून के धब्बे  धुलेंगे  कितनी  बरसातों के बाद 
राजनेता- बब्बर शेर मुजरे नहीं सुना करते अदीब...परदेसियों के तो हरगिज़ नहीं! वे तो बस दहाड़ सुनते है. आपका काम सवाल पूछना है, आप सवाल पूछिए.
पत्रकार- मेरा सवाल है कि परप्रांतीय कोई उठाईगीर हैं क्या? इनकी अगली पीढ़ी भी यहीं इसी प्रान्त में पैदा हो चुकी है. आप बताएँगे कि इन्हें प्रांतीय कहलाने में अभी और कितना अरसा लगेगा?
राजनेता- साँप होता है न, उसका बच्चा तो सपोला ही कहलायेगा? शहर में रहने से क्या अपना स्वभाव छोड़ देगा?...ये लोग परप्रांतीय थे और परप्रांतीय ही रहेंगे. 
पत्रकार- चलो, मलेरिया का खात्मा तो हो गया. मगर डायबिटीज़, कैंसर, एच आई वी, हार्ट अटैक आदि का क्या होगा? अपने प्रिय प्रान्त को एक सम्पूर्ण निरोगी प्रान्त बनाने के लिए आप कौन से ठोस कदम उठाने जा रहे है. 
राजनेता- हम प्रादेशिक सीमा के चप्पे-चप्पे पर कार्यकर्ता तैनात करेंगे. जो परप्रांतीय मानसूनी हवाओं को प्रदेश में तभी प्रवेश देंगे जब वे परप्रांतीयता नामक विषाणु से रहित होने का प्रमाण प्रस्तुत करेंगी. साथ ही वे यह भी देखेंगे कि बैरी बदराओं की आड़ में राज्य की जनता की सेहत से खिलवाड़ करने के लिए कहीं पडौसी सूबों से नर्सों की कबूतरबाजी तो नहीं की जा रही?
पत्रकार- ठीक है, मगर इस योजना में मानवीय चूकों की सदा गुंजायश रहेगी. इस के मद्दे-नजर आपके पास क्या विकल्प हैं?
राजनेता- सही कहा आपने. परप्रांतीयता की समस्या से सदा-सदा के लिए निजात पाने के लिए हमें अपने प्रिय प्रान्त को देर सबेर किसी टापू पर शिफ्ट करना होगा...राज्य की जनता को चाहिए कि वह इस कठोर निर्णय के लिए तैयार रहे. 



Sunday, August 8, 2010

दुआ

मैं हमेशा से तंगदिल और कमतर इंसान नहीं था, हालातों ने मुझे ऐसा बना दिया है.  किसी समय मेरे झोंपड़े में भी दस-दस, पंद्रह- पंद्रह मेहमान हफ़्तों-हफ़्तों रहेमगर मजाल है जो अपने चेहरे पर जरा भी शिकन आई हो. आज यह आलम यह है कि दो जनों के आ जाने से ही प्राण सूखने लगते हैं. सुबह- सुबह जब फ्लश में बाल्टी भर पानी डाला जाता है तो अपना कलेजा मुंह को आने लगता है. गुसल में अतिथियों द्वारा डाला गया एक-एक मग पानी हमें अपनी नंगी पीठ पर दस-दस कोड़ों की तरह बरसता लगता है.... खुदाया या तो नल दे वरना ये दिन किसी को न दिखाए.  
                             फिर जच्चागिरी
आठ दस साल हुए फ्लेट और कार की किश्तों से फ़ारिग हुए. फिर सब तरफ से बराबर दबाव डाला जा  रहा है कि गाडी बदल लो , बँगला बुक करा लो. मतलब फिर से बैंकों के चक्कर, लोन की किश्तें चुकाने का सिलसिला. ठीक वैसा ही जैसे बच्चे बियाहे ठाए हो जाने पर किसी औरत को फिर से जच्चागिरी का शौक चर्राने लगे.
                              सच्चा भारतीय
खबर है कि अमरीका और यूरोप में आइसक्रीम सबसे जियादा खाई जाती है. खुद बराक ओबामा आइसक्रीम के दीवाने हैं. छटे चौमासे शादियों- जन्मदिनों की दावतों में मैं आइसक्रीम खा जुरूर लेता हूँ, मगर प्रेम से तो मैं गन्ना ही चूसता हूँ. इसी तरह पिज्जा बर्गर के   बदले भड़भूजे से भुनवाये चने  ही चबाना पसंद करता हूँ. तभी तो सच्चा भारतीय होने पर मैं गर्व से भर उठा हूँ!