Thursday, October 27, 2011

शोध के ये दीवाने



इनसे मिलिये....श्रीमति हरकाली। कुछ दिनों पहले गुमशुदा हो गयी थीं। फिर एक दिन इनके घर के बाहर नयी नेम प्लेट देखी गयी। नाम के आगे डाक्टर लगा हुआ था। ओह... तो मोहतरमा अज्ञातवास में जचगी करा कर शिशु के साथ लौट आई हैं। सुना है कोयल की एक प्रजाति अंडे सेने की जहमत से बचने के लिए अपने अंडे कोए के घोंसले में रख छोडती है जो उन्हें अपना समझ कर से देते हैं। इसी तरह, आपने भी बिना पेट फुलाए, जी मितलाए या प्रसव पीड़ा भुगते सीधे माँ बनाने का गौरव प्राप्त कर लिया। हाँ, कोयल भले ही अपने अंडे खुद देती हो, इनके बारे में यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है।
...और इस विभूति से मिलिये। रिसर्च कर रही थी। डाटा कलेक्ट करते करते हसबैंड कलेक्ट कर बैठी। इल्म की राह से भटक कर फॅमिली की राह पर चल निकली:
राहे खुदा  में  आलमे  रिंदाना  मिल गया
मस्जिद को ढूंढते थे कि मैखाना मिल गया
कहाँ कागजों पर कलम घसीटने वाली थी, कहाँ नवजात के पोतड़े फचीटने लगी। ...फिर एक दिन अचानक इन्हें ख़याल आया कि जैसे एनआरआई लड़के शॉर्ट विजिट पर स्वदेश आते हैं और सगाई अथवा मंडप कर उल्टे पाँव लौट जाते हैं, उसी तर्ज़ पर ये भी एक फ्लाइंग विजिट मारें और हाथों हाथ थीसिस जमा कर पिया के घर लौट जाएँ। सो, आजकल इसी मुहिम पर वतन में हैं और गाइड की नाक में दम किए हुए हैं।
चलिये, अब इन महाशय से मिलने सीधे इनकी डेस्क पर ही चलते हैं। अरे...ये तो सीट से नदारद हैं। नहीं, नहीं निश्चित ही ये फील्ड में सर्वे करने नहीं गए। जरूर कोई सा आवेदन पत्र लाने लोक सेवा आयोग के दफ्तर गए होंगे या फिर डाक घर में उसे स्पीड पोस्ट करने। जानते हैं कि डिग्री मिल जाने भर से प्रोफेसरी हाथ आने वाली नहीं, सो हर तरफ हाथ मारने में कोई हर्ज़ नहीं समझते। एकाधिक राज्यों के पीएससी से ले कर बैंकों के पीओ, वन रक्षक, केवी व्याख्याता, यहाँ तक कि प्राथमिक शिक्षक तक की कोई परीक्षा नहीं छोड़ते। वैसे ये शोध केंद्र पर भी बैठते हैं, और खूब बैठते हैं। नहीं बैठते तो ऑनलाइन ट्रेडिंग कहाँ से करते? शेयर और डिबेंचर की गलियों के फेरे कैसे लगाते? शोध केंद्र पर इन्हें शोध के अलावा बहुत कुछ करते देखा जा सकता है। कमाल यह है कि फिर भी इनकी थीसिस लगभग तैयार है! मीर साहब भी पशोपेश में हैं:
दामन पे छीटें हैं न खंजर पे कोई दाग
तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो
क्या है कि ये यूजीसी फैलो हैं, काफी ज़हीन भी हैं!!

Wednesday, October 19, 2011

चौथे तल्ले का मकान



हम दूसरी मंज़िल छोड़ कर चौथी पर क्या रहने को गए कि कालोनी को मुद्दा मिल गया। ऐसे चर्चे चले मानो मीडिया के हाथ कोई अन्ना हज़ारे लग गया हो। तरह-तरह के मुंह तरह-तरह की बातें करने लगे। एक महाशय ने हाँकी- पकी उम्र में इतने ऊपर! ना, बाबा न!! मर गए तो कोई तोपों की सलामी देने आने वाला नहीं...हमें एलाट हुआ होता, हम तो साफ मना कर देते। अरे, शहादत का इतना ही शौक होता तो फौज में भर्ती न हो गए होते। एक देवी जी ने, जो भरी बदन की मालकिन भी थी, चुस्की ली- और मैडम जी को तो देखो! रोज-रोज की सैर से पेट नहीं भरता था जो अब चौथे माले पर भी चढ़ बैठी! दो-दो जवान बच्चों की माँ हैं, मगर शरम रत्ती भर नहीं। पता नहीं इस अधेडपन में कमर  पतली करके कहाँ कूल्हे मटकाने जाएंगी, महारानी जी!
एक अजीज़ मित्र का अरसे से चौथी मंज़िल पर मुकाम रहा है। मकान बदलने की खबर देते हुए उनसे हमने कहा- अब हम भी आपके लेवल पर आ गए हैं। बोले- यानि गिन-गिन कर बदले लेंगे! शिफ्टिंग के बाद सभी दोस्तों को आ कर नया मकान देख जाने की पेशकश की। तब से तीन चार वीक ऐंड गुज़र गए, कोई इधर नहीं फटका। कहा किसी ने कुछ नहीं, हम समझ गए कि भाई लोग पोतों-दोहतों का मुंह देखे बिना दुनिया नहीं छोडना चाहते। हमने लाख दलील दी कि भले मानुसों, कौन कहता है कि आप दुरन्तो (राजधानी एक्सप्रेस की छोटी बहन) की तरह इंदौर से छूट कर धुर मुंबई की धरती पर ही जा उतरो? अरे भाई, मंज़िल दर मंज़िल जर्नी ब्रेक करते हुए गंतव्य तक आओगे तो यकीन मानिए आपको कुछ नहीं होगा। हर माले पर घड़ी भर दम लेने को बेंच, छत का पंखा और गला तर करने को घड़ा-गिलास रखवाने का लालच भी दिया। साथ ही यह भी वादा किया कि एक-एक खोमचे वाले और मुन्ने-मुन्नियाँ बहलाने के लिए गुब्बारे वाले का इंतजाम भी करवाए देते हैं....मगर नतीजा कोई खास नहीं! सुन तो बहुत रखा था कि जो जितना ऊपर बैठा है वह उतना ही अकेला होता है, अब समझ में भी आ गया।
फिराक में आसरा ढूंढ कर हादसा भुलाने की कोशिश की:
क्या  रखा है  आस रहने  ही में,  क्या  रखा  है  पास  रहने  ही में
एक आदत सी हो गयी है फिराक, वरना क्या रखा है उदास रहने ही में
कोशिशें रंग लाने लगी थी, तबियत कुछ संभलने लगी थी कि एक जोरदार झटका लगा। अगला महीना आ गया... दूध वाले ने बिल आगे बढ़ाया। हमने कहा- दूध तो उतना ही लिया है फिर पंद्रह रुपये फालतू काहे के ? बोला- मंज़िल सरचार्ज, भूतल के बाद पाँच रुपये फी मंज़िल के हिसाब से। अभी पेपर वाला, केबल वाला, सब्जी वाली बाई, काम वाली बाई आना बाकी हैं, देखते हैं आगे क्या होता है?

Wednesday, September 28, 2011

हम तो डूबेंगे सनम...

पिछले दिनों एक पुस्तक प्रदर्शिनी मे जाना हुआ। पुस्तक प्रदर्शिनी से सटे मैदान में एक हस्त-शिल्प प्रदर्शिनी भी लगाई गयी थी। ये दोनों आयोजन एक दूसरे को सहारा देते से लग रहे थे जैसे दो अल्पमत पार्टियां मिल कर साझा सरकार बनाने की जुगत भिड़ा रही हों, मगर बना न पा  रही हों। इन्हें देख कर मालूम हुआ की एक ही समय, एक ही जगह दोनों प्रदर्शिनियों का लगना केवल इत्तिफाक़ नहीं था बल्कि आयोजकों की एक सोची समझी रणनीति थी। एक तरफ जहां पुस्तक प्रदर्शिनी से मायूस दर्शकों के लिए हस्त-शिल्प मेला एक उम्मीद था, वहीं हस्त-शिल्प मेले से ठुकराये हुए बंदे पुस्तक प्रदर्शिनी में शरण ढूंढ सकते थे। यही वजह थी की दोनों की अलग-अलग सरजमीं की तुलना में पुस्तक प्रदर्शिनी और हस्त-शिल्प मेले की बीच की नो मैंस लैंड कहीं  ज्यादा आबाद नज़र आती थी।
            मस्जिद से मयखाने तक मिलते हैं नक्शे-पा
            या  रिंद गया  होगा, या  शेख़  गया होगा
प्रदर्शिनी को राष्ट्रीय क्यों कहा गया था, यह एक रहस्य था जिसे आयोजक ही बेपरदा कर सकते थे। हो सकता हो इसके पीछे राष्ट्र-प्रेम का जोर मारना हो या फिर इश्तेहार जगत की ठगिनी विद्या। अलबत्ता भारत जैसे अति विशाल और जगत-गुरु कहलाने वाले देश की अस्मिता के साथ यह खिलवाड़ करने जैसा ही था। दस-दिनी अवधि के करीब आधी बीत जाने पर भी पुस्तक प्रदर्शिनी का मंज़र बेहद रोमांचक बना हुआ था। कुछ स्टालों पर किताबों के कार्टून बंधे पड़े थे। कहना मुश्किल था कि इन्हे अभी खोला नहीं गया था या फिर ये वापसी के सफर पर लदने को तैयार बैठे थे। यही नहीं, कोई-कोई खोली तो एकदम खाली पड़ी थी गोया कोई बालिका वधू जवानी भरने से पहले ही विधवा हो गयी हो। एक स्टाल ऐसा भी था जिसमे सिर्फ तीन-चार नक्शे टाँगे गए थे, फिर भी दो-तीन शख्स वहाँ सुबह से न जाने किस प्रकार का धंधा करने को बैठे हुए थे। ज़्यादातर स्टालों पर इक्के-दुक्के ग्राहक यूं खड़े नज़र आते थे जैसे जेठ की भरी दुपहरी में किसी सब्जी के ठेले पर जल्दी-जल्दी सब्जियाँ छांटती गृहिनियाँ। कहना न होगा जिस ठाट से हमने ये जुड़वां प्रदर्शिनियां देखी उस ठाट से किसी फिल्म का विशेष शो भी भला सेंसर बोर्ड अथवा बाल ठाकरे परिवार के सदस्य क्या देखते होंगे!
शब्द कोष, सचित्र विश्व-कोष, थिसेरस, बच्चों की ड्राइंग पेंटिंग, फेंगशुई, बोन्साई, वास्तु और सेल्फ-हेल्प जैसे ग्रन्थों को छोड़ दिया जाए तो प्रदर्शिनी कमोबेश पुरानी, अविक्रित पुस्तकों की सालाना स्टॉक क्लीयरिंग सेल नज़र आ रही थी। बाज स्टाल पर तो बरसाती पानी के धूसर धब्बों से सजी पुस्तकों की कतार दर कतार इस हद खस्ताहाल थीं कि शायद पन्ने पलटने का जोखिम भी नहीं झेल पाती। वे किसी गलती की वजह से यहाँ थीं, जबकि उन्हे उनके सही स्थान यानि राष्ट्रीय संग्रहालय में होना चाहिए था। हैरत की  बात थी कि यह जानते हुए भी कि यही पुस्तकें रद्दी की दुकान पर आधे दामों में आसानी से मिल जाएंगी, काउंटर पर बैठे हजरतों को दिन भर ऊंघना तो मंजूर था मगर दस परसेंट के ऊपर एक पैसा भी छोडना मंजूर नहीं था। लिहाजा कुछ चुनींदा पुस्तकें हाथों तक जरूर पहुँच रही थी मगर उनमे से कोई भी ऐसी नहीं थी जो दिलों तक उतर सकती। ख़ासी जद्दोजहद के बाद प्रदर्शिनी के मान की खातिर दस फीसद छूट पर पचपन रुपये में खरीदी गई इकलौती किताब हमें दस रुपये के टिकिट, बीस रुपये की पार्किंग और बोरियत भगाने के एवज में खाई तीस रुपये की भेल समेत कुल एक सौ पंद्रह रुपये में पड़ी।  

Wednesday, September 14, 2011

तू डाल डाल, मैं पात पात


सुनते हैं कि जाने माने शायर असरार यानि मजाज़ जब लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ते थे तभी खासे मशहूर हो चले थे। वो थे भी बेहद आकर्षक! लिहाज़ा कॉलेज की लड़कियां उनकी फोटो अपनी डायरी के पन्नों की तह में छुपा कर रखा करती थी। अक्सर किसी खडूस प्रोफ़ेसर की क्लास में चोरी छिपे तस्वीर का दीदार करते हुए हंसी-खुशी क्लास झेल लिया करती थी। कुछ इसी तरह का वाकया एक रोज़ खाकसार की क्लास में हाजिर हुआ। देखा जाए तो हम स्कूल की तर्ज़ पर खाली क्लास को घेरने में यकीन नहीं रखते। मगर क्या कीजिये, हमारा विषय रिसर्च-स्टेटिस्टिक्स ही कुछ ऐसा है। उस पर पढ़ना भी यह हरेक को पड़ता है, चाहे उसने गणित दसवीं जमात तक पढ़ कर ही क्यों न छोड़ दिया हो। चुनांचे मौका हाथ आते ही हम एक्सट्रा क्लास लपक लेने से बाज नहीं आते। तो किस्सा मुख्तसर है कि हम पहला पीरियड खत्म करने के बाद दूसरा भी पढ़ा रहे थे। विद्यार्थी किसी सवाल पर काम करने में भिड़े थे और हम मदद के इच्छुकों की तलाश में कतारों के बीच गश्त कर रहे थे। तभी ठेठ पिछली कतार में एक लड़की पर निगाहें टिक गईं। करीब पहुंचे तो देखा मोहतरमा की गोद में एक किताब खुली पड़ी है। किताब मनोविज्ञान की थी और हमारे एक साथी प्रोफेसर ने लिखी थी। 
अचानक यूं नज़रों में आ जाने पर लड़की घबरा उठी और सफाई देने लगी। हमने कहा- नाहक ही शर्मिंदा हो रही हो...आखिर कोई गुलशन नंदा का नॉवेल थोड़े ही पढ़ रही थी! ख्यात विद्वान लाला हरदयाल एक साथ कई ग्रंथ न केवल पढ़ लेते थे बल्कि अक्षरशः कंठस्थ भी कर लेते थे। आज की बात करें तो शतरंज प्रतिभा विश्वनाथन आनंद एक ही समय  अलग-अलग बोर्डों खेल रहे दर्जनों प्रतिद्वंदियों को चित करने का कारनामा कई बार दिखा चुके  हैं । हमे तो गर्व है कि तुम इनकी जमात में आ खड़ी हुई हो। हमारा  तो आप सभी से बस इतना कहना है कि गोद में छुपा-छुपा कर क्यों, डेस्क पर रख कर खुल्लमखुल्ला पढ़ो। हाँ, कभी ऐसा लगे कि स्टेटिस्टिक्स की खुराक कड़वी है या फिर जबरिया आप लोगों के गले उतारी जा रही है, तो थोड़ा इशारा कर देना।
क्लास छोड़ कर पहले तो हमने मनोविज्ञान के प्रोफसर से पार्टी ली। फिर वह तरकीब खोजने में लग गए जिससे अपने विषय में भी वो कशिश पैदा की जा सके कि विद्यार्थी उसकी किताब भी डेस्क की आड़ में छुपा कर पढ़ने लगें। अगले हफ्ते हमने भी स्टेटिस्टिक्स का टेस्ट रखने का फैसला कर लिया।  

Monday, August 22, 2011

बचना ऐ हसीनों, लो मैं आ गया....!!

खुदाई, छिलाई और घिसाई के अनगिनत सत्रों के कठोर तप के बाद आखिर दंताधिदेव को मजबूरन हमारी भक्ति से प्रसन्न हो कर हमें चमक मारती हुई दन्त पंक्ति का वर देना ही पड़ा. इस तरह वो चिर-प्रतीक्षित दिन भी आ ही गया जब दंत-पति ने हमारे मुखमंडल में दांत जड़ कर सालों से रिक्त पड़े स्थान की पूर्ति कर दी. बोले- अभी टेम्पररी  फिक्स कर रहा हूँ. एक हफ्ता लगा कर देख लो...ठीक लगा तो परमानेंट कर देंगे. हमने कहा- जी, यही ठीक रहेगा. एक हफ्ते का प्रोबेशन अच्छा है...देख लेते हैं कि बेलेंस बराबर है कि नहीं. कहीं ऊँच-नीच तो नहीं रह गयी. लोगों की फीडबैक ले लेते हैं ताकि कुछ कमी-बेशी दिखे तो समय रहते सुधरवाई जा सके. काम मुकम्मल होने पर उनकी जय जयकार के बाद वर्कशॉप से निकल कर जब हम घर की ओर मुड़े तो पत्नी बोली- सुनो जी, जरा खजराना मंदिर ले चलो. किसी भी नयी चीज के इस्तेमाल से पहले गणेश जी का आशीर्वाद ले लेते हैं, अच्छा रहेगा. 
         अगले दिन कॉलिज पहुंचे तो साथी शिक्षक बधाई देने कमरे में जुड़ गए. एक बोला- बधाई हो सर, पुष्ट उभारों से आज तो चेहरे की सुगढ़ता देखते ही बनती है...बिलकुल जवान लग रहे हैं! दूसरा- जवान? मैं तो कहता हूँ बाल तो माशाअल्लाह अभी आपके पूरे हैं और कोई खास सफ़ेद भी नहीं...थोडा स्किन केयर ट्रीटमेंट ले लें तो टीन ऐज में ही न पहुँच जाएँ! तीसरा- और जरा दांतों को तो देखो...कैसे मोतियों से चमक रहे हैं! मैडम को काला टीका लगा कर भेजना चाहिए था. चौथा- वाकई सर, नकली दांतों के सामने असली वाले तो ऐसे लग रहे हैं
जैसे यजमान के आँगन में छिडकाव करने वाले सक्के. सुन कर हम फूट पड़े- अरे कमबख्तों, हम यहाँ हनुमान जी सरीखा मुंह लिए घूम रहे हैं और तुम्हे ठिठोली की पड़ी है...हमें यूँ फील हो रहा है जैसे होंठों के नीचे सुर्ती दबा रखी हो या किसी बॉक्सर को दांतों पर गद्दे की तह जमा कर बाउट के लिए तैयार कर दिया गया हो, और तुम सबको मसखरी सूझ रही है. 
    तभी स्टुडेंट्स का एक जत्था आया. उनमे से एक बोला- अरे वाह, सर...फिर कल से तो आप क्लास लेने आ रहे हैं! 'नहीं, अभी थोडा रुको'. 'क्यों सर?...अब तो आपके नए दांत भी आ गए हैं.' 'हाँ, मगर स्टीयरिंग पर पहली दफा बैठते ही क्या कोई गाड़ी मार्केट में निकाल कर ले जाता है? अभी दो चार रोज गली मोहल्ले में घुमायेगें तो हाथ साफ हो जायेगा. फ़िक्र मत करो जैसे ही हमें नए दांत बेगाने के बजाय अपने से लगने लगेंगे, मैं हाज़िर हो जाऊँगा और सारा हिसाब चुकता कर दूंगा. 

Saturday, August 6, 2011

दांत, माप और धोखा

धोखा 
मुक़र्रर तारीख पर दांतों का माप देने हम क्लिनिक पहुंचे. इशारा किये गए फर्नीचर पर चढ़ कर अधबैठे या अधलेटे से, हाथ में फीता लिए डॉक्टर के प्रकट होने का इंतज़ार करने लगे. तभी एक जूनियर डॉक्टर ने एंट्री मारी, वो भी खाली हाथ. आते ही हमें भौचक करते हुए सवाल दागा- आपने खाने खाया? हमने कहा- हाँ, दो बजे खा लिया था...मगर आप पूछ क्यों रहे हैं? आखिर खाने का माप से क्या लेना देना? वे शायद काम में ज्यादा बातों में कम विश्वास रखते थे, सो एक मोनालिसा मुस्कान बिखेर कर गायब हो गए. हम आगत की आशंका से काँप उठे.

तैनाती
उसी वक़्त सफ़ेद लबादे में दो तीन डॉक्टर  मुंह पर मास्क और हाथों में दस्ताने चढ़ाये हमारे इर्द-गिर्द तैनात हो गए. उन्हें देख कर यह भेद कर पाना मुश्किल था कि उनमे से कौन जूनियर डॉक्टर है और कौन उनका सरगना यानि सीनियर. हम सोचने लगे ... हम टीचर लोग तो पढ़ाते वक़्त अपना मुंह उघाड़े रखते हैं, फिर आपरेशन के दौरान डॉक्टर अपना मुंह क्यों ढक लेते हैं. बहुत विचार करने के बाद यही समझ आया कि अपनी पहचान छुपाने के लिए ही वे ऐसा करते हैं ताकि चाकू की चूक से मरीज़ की जान वान चली जाने पर उनकी खुद की जान बच सके. 

आक्रमण 
खैर, इससे पहले कि हम कुछ पूछने को अपना मुंह खोलते, निचले होंठ को पीछे धकेलते हुए उन्होंने राजपूतों के ड्राइंग रूम में आड़े-तिरछे सजे भालों के अंदाज़ में कई सुइयां हमारे मुंह में घोंप दी, बस इस अंतर के साथ कि यहाँ भालों की नोंक नीचे की तरफ और हमारे अन्दर थीं. यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता कि सुइयां मसूढ़ों में ठोकी गयी थी, गाल में, या गाल और मसूढ़ों के संधिस्थल में. अलबत्ता, इतना जरूर कहा जा सकता है कि घड़ी भर में ही हमें अपना चेहरा मशक जैसा फूला-फूला लगने लगा. निचले होंठ को जहाँ तहां दबा कर देखा तो लगा जैसे स्कूटर की ट्यूब में पंचर टेस्ट कर रहें हों. अब आती क़ज़ा से बचने का कोई रास्ता न देख हमने खुद को डॉक्टरों के हवाले कर दिया.  उन्होंने हमारे इधर-उधर के दांतों को किसी खराद पर धर कर धुंआधार छीलना शुरू किया. शल्य-क्रिया कक्ष में उड़ते कणों की धुंध  और स्टोन-क्रशर सी गंध फैल गयी. दांत के एपीसेंटर से उठते टीस के जलज़ले पूरे बदन को अपनी चपेट में लेने लगे. फ़िराक साहब का एक शे'र है:
उसका   सरापा   हमसे   पूछो   
सर से पाँव तक चेहरा ही चेहरा 
वहां जो चेहरा था वो यहाँ दांत था. हमारा  समूचा वजूद भी दांत बन कर रह गया था. रह-रह कर सीट से इंच भर ऊपर उछलता हमारा पृष्ठ भाग, पूरे शरीर का दांतों की दिशा में बेतहाशा सिकुड़ना और चेहरे पर खौफ और दर्द की लहरियां भी उस संगकार को अपनी धुन से न डिगा सकी. कसम खुदा की, विद्यार्थियों और परिजनों की श्रवण संबंधी तकलीफों का ख़याल न होता तो हम बीच में ही उठ कर भाग खड़े होते.  

Saturday, July 23, 2011

वो क़यामत का दिन... यानि हमारा जाना दांतों के डॉक्टर के पास

कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है 
हमारे सामने के दो दांत पहले ही स्वर्ग सिधार चुके थे. जब तीसरे ने भी उधर की राह पकड़ी तो बोलते वक़्त पैदा हो गयी दरार से हवा निकलने के कारण सुनने वाले पहेलियाँ सी बूझते नज़र आने लगे. उन पर मेहरबानी की गरज से तीन दांत लगवाने हम दांतों के डॉक्टर के पास गए. अव्वल तो दन्त स्वास्थ्य की अनदेखी पर उन्होंने हमें लम्बा-चौड़ा भाषण पिलाया. फिर लगभग मुंह के अन्दर सर घुसाते हुए घनघोर मुआयने के बाद व्यवस्था दी कि आजू-बाजू के दांत भी सड़े हुए हैं, किनारे की दाढ़ भी खराब है, पहले उन्हें निकालना होगा...लिहाज़ा भरे-भरे गए थे, खाली-खाली लौटे. 
            आये थे हँसते खेलते मयखाने में फ़िराक 
             जब  पी  चुके शराब  तो   संजीदा हो गए. 
बहुत बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले 
दांतों की ताँक-झाँक, एक्स- रे और आखिर में चिकित्सकों के छुरे- जमूरे के नीचे से निकले तो पता लगा कि बुलंद दन्त-मीनारों की जगह ग्राउंड जीरो बन चुका है. फर्क सिर्फ इतना रहा कि वहां दो मीनारें ध्वस्त की गयी थी यहाँ तीन. वहां एक झटके में इस कृत्य को अंजाम दे दिया गया था तो यहाँ आहिस्ता-आहिस्ता यह विध्वंस संपन्न हुआ था. वहां लोग मरते वक़्त अपने-अपने ईश्वर को भी याद नहीं कर पाए थे, यहाँ हम राम-राम करते हुए भी हलाल होने से न बच पाए थे. खैर, आखिर जब हम क्लिनिक से बाहर लाये गए तो मुंह का हाल अमूमन उस युवती की तरह हो गया था जिसे मनचलों ने गेंग रेप के बाद चलती गाड़ी से बाहर फेंक दिया हो....वही ज़ख्म, वही अधमरापन, वही दुनिया से मुंह छुपाने की इल्तिजा. 
निर्माण कार्य जारी, असुविधा के खेद है  
अब तो आलम यह है कि मुंह में जगह-जगह खुदाई से जिंदगी हलकान है. खाने पीने के तमाम रास्ते या तो बंद हैं या परिवर्तित कर दिए गए हैं. बोलना तो सरासर मुहाल है. थोडा बोलना भी दिमागी कसरत का सबब बन चुका है क्योंकि त-वर्ग के शब्दों के पर्यायवाची तलाशने पड़ रहे हैं या उनका अंग्रेजी तर्जुमा करना पड़ रहा है. दन्त-निर्माण का कार्य बी आर टी एस सड़कों या फ्लाई ओवरों की तरह बूढ़े कछुए की चाल से चल रहा है. हर बार जांच के लिए बुलाने के बाद डॉक्टर अगली तारीख दे देता है. नतीजा वही- तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़. अब तो एक्स्पेक्ट करते-करते हम आजिज़ आ चुके, दांतों की डिलीवरी कब तक होगी कोई बेजान दारूवाला भी नहीं बता सकता...तब तक ऐसे ही गुजर करनी होगी जैसे कोई हाकी या फ़ुटबाल की टीम दस नहीं, नौ नहीं बल्कि सात खिलाडियों के साथ खेलती है.